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Saturday, December 13, 2014

ऋषि दुर्वासा और देवराज इंद्र

ऋषि दुर्वासा और देवराज इंद्र 
एक बार भगवान शंकर के अंशभूत महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचर रहे थे। घूमत-घूमते वे एक मनोहर वन में गए। वहाँ एक विद्याधर सुंदरी हाथ में पारिजात पुष्पों की माला लिए खड़ी थी, वह माला दिव्य पुष्पों की बनी थी। उसकी दिव्य गंध से समस्त वन-प्रांत सुवासित हो रहा था। दुर्वासा ने विद्याधरी से वह मनोहर माला माँगी। विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके वह माला दे दी। माला लेकर उन्मत्त वेषधारी मुनि ने अपने मस्तक पर डाल ली और पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।

इसी समय मुनि को देवराज इंद्र दिखाई दिए, जो मतवाले ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ बहुत-से देवता भी थे। मुनि ने अपने मस्तक पर पड़ी माला उतार कर हाथ में ले ली। उसके ऊपर भौरे गुंजार कर रहे थे। जब देवराज समीप आए तो दुर्वासा ने पागलों की तरह वह माला उनके ऊपर फेंक दी। देवराज ने उसे ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उसकी तीव्र गंध से आकर्षित हो सूँड से माला उतार ली और सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दी। यह देख दुर्वासा क्रोध से जल उठे और देवराज इंद्र से इस प्रकार बोले, ''अरे ओ इंद्र! ऐश्वर्य के घमंड से तेरा ह्रदय दूषित हो गया है। तुझ पर जड़ता छा रही है, तभी तो मेरी दी हुई माला का तूने आदर नहीं किया है। वह माला नहीं, श्री लक्ष्मी जी का धाम थी। माला लेकर तूने प्रणाम तक नहीं किया। इसलिए तेरे अधिकार में स्थित तीनों लोकों की लक्ष्मी शीघ्र ही अदृश्य हो जाएगी।'' यह शाप सुनकर देवराज इंद्र घबरा गए और तुरंत ही ऐरावत से उतर कर मुनि के चरणों में पड़ गए। उन्होंने दुर्वासा को प्रसन्न करने की लाख चेष्टाएँ कीं, किंतु महर्षि टस-से-मस न हुए। उल्टे इंद्र को फटकार कर वहाँ से चल दिए। इंद्र भी ऐरावत पर सवार हो अमरावती को लौट गए। तबसे तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो गई। इस प्रकार त्रिलोकी के श्रीहीन एवं सत्वरहित हो जाने पर दानवों ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी। देवताओं में अब उत्साह कहाँ रह गया था? सबने हार मान ली। फिर सभी देवता ब्रह्माजी की शरण में गए। ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान विष्णु की शरण में जाने की सलाह दी तथा सबके साथ वे स्वयं भी क्षीरसागर के उत्तर तट पर गए। वहाँ पहुँच कर ब्रह्मा आदि देवताओं ने बड़ी भक्ति से भगवान विष्णु का स्तवन किया। भगवान प्रसन्न होकर देवताओं के सम्मुख प्रकट हुए। उनका अनुपम तेजस्वी मंगलमय विग्रह देखकर देवताओं ने पुनः स्तवन किया, तत्पश्चात भगवान ने उन्हें क्षीरसागर को मथने की सलाह दी और कहा, ''इससे अमृत प्रकट होगा। उसके पान करने से तुम सब लोग अजर-अमर हो जाओगे, किंतु यह कार्य है बहुत दुष्कर अतः तुम्हें दैत्यों को भी अपना साथी बना लेना चाहिए। मैं तो तुम्हारी सहायता करूँगा ही...।''

भगवान की आज्ञा पाकर देवगण दैत्यों से संधि करके अमृत-प्राप्ति के लिए प्रयास करने लगे। वे भाँति-भाँति की औषधियाँ लाएँ और उन्हें क्षीरसागर में छोड़ दिया, फिर मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नागराज को नेती (रस्सी) बनाकर बड़े वेग से समुद्र मंथन का कार्य आरंभ किया। भगवान ने वासुकि की पूँछ की ओऱ देवताओं को और मुख की ओर दैत्यों को लगाया। मंथन करते समय वासुकि की निःश्वासाग्नि से झुलसकर सभी दैत्य निस्तेज हो गए और उसी निःश्वास वायु से विक्षिप्त होकर बादल वासुकि की पूँछ की ओर बरसते थे, जिससे देवताओं की शक्ति बढ़ती गई। भक्त वत्सल भगवान विष्णु स्वयं कच्छप रूप धारण कर क्षीरसागर में घूमते हुए मंदराचल के आधार बने हुए थे। वे ही एक रूप से देवताओं में और एक रूप से दैत्यों में मिलकर नागराज को खींचने में भी सहायता देते थे तथा एक अन्य विशाल रूप से, जो देवताओं और दैत्यों को दिखाई नहीं देता था, उन्होंने मंदराचल को ऊपर से दबा रखा था। इसके साथ ही वे नागराज वासुकि में भी बल का संचार करते थे और देवताओं की भी शक्ति बढ़ा रहे थे।

इस प्रकार मंथन करने पर क्षीरसागर से क्रमशः कामधेनु, वारुणी देवी, कल्पवृक्ष, और अप्सराएँ प्रकट हुईं। इसके बाद चंद्रमा निकले, जिन्हें महादेव जी ने मस्तक पर धारण किया। फिर विष प्रकट हुआ जिसे नागों ने चाट लिया। तदनंतर अमृत का कलश हाथ में लिए धन्वंतरि का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देवताओं और दानवों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। सबके अंत में क्षीर समुद्र से भगवती लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं। वे खिले हुए कमल के आसन पर विराजमान थीं। उनके अंगों की दिव्य कांति सब ओर प्रकाशित हो रही थी। उनके हाथ में कमल शोभा पा रहा था। उनका दर्शन कर देवता और महर्षिगण प्रसन्न हो गए। उन्होंने वैदिक श्रीसूक्त का पाठ करके लक्ष्मी देवी का स्तवन करके दिव्य वस्त्राभूषण अर्पित किए। वे उन दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित होकर सबके देखते-देखते अपने सनातन स्वामी श्रीविष्णु भगवान के वक्षस्थल में चली गई। भगवान को लक्ष्मी जी के साथ देखकर देवता प्रसन्न हो गए। दैत्यों को बड़ी निराशा हुई। उन्होंने धन्वंतरि के हाथ से अमृत का कलश छीन लिया, किंतु भगवान ने मोहिनी स्त्री के रूप से उन्हें अपनी माया द्वारा मोहित करके सारा अमृत देवताओं को ही पिला दिया। तदनंतर इंद्र ने बड़ी विनय और भक्ति के साथ श्रीलक्ष्मी जी ने देवताओं को मनोवांछित वरदान दिया।


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Saturday, August 30, 2014

Devdatta Aur Jalpad - देवदत्त और जलपाद

बहुत समय पहले की बात है, तब दक्षिण देश के कम्बुक नाम के नगर में एक ब्राह्मण रहता था| उसका नाम था - हरिदत्त| हरिदत्त नगर का एक संभ्रांत एवं साधन-संपन्न व्यक्ति था| धन-दौलत की उसके पास कोई कमी नहीं थी| उसे बस एक ही दुख था| उसके यहां कोई संतान नहीं थी| धीरे-धीरे उसकी आयु बढ़ती गई और वह प्रौढ़ावस्था में पहुंच गया| हरिदत्त अब संतान की ओर से बिल्कुल निराश हो चुका था| उसने मन में धैर्य कारण कर लिया था कि संतान का सुख उसके भाग्य में लिखा ही नहीं है, किंतु विधि का विधान कुछ और ही था| एक दिन उसके घर-आंगन में शिशु की किलकारियां गूंज उठीं| उसे एक पुत्र की प्राप्ति हो गई|

हरिदत्त और उसकी पत्नी ने भली-भांति अपने पुत्र का लालन-पालन किया, उसके लिए अच्छी शिक्षा का प्रबंध किया, लेकिन कुछ दिन बाद उनका पुत्र देवदत्त कुसंगति में पड़ गया| उसे जुआ खेलने का व्यसन लग गया| एक दिन वह जुए में अपना सब कुछ, यहां तक कि अपने शरीर पर पहने हुए वस्त्र भी हार गया| तब उसे बड़ी लज्जा महसूस हुई| शर्मिंदगी के कारण वह अपने घर न जाकर नगर से बाहर की ओर चल पड़ा| उसने निश्चय कर लिया था कि अब वन अपने माता-पिता को अपना मुंह नहीं दिखाएगा और किसी नदी या सरोवर में डूबकर अपने जान दे देगा, किंतु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था| देवदत्त जब नगर से बाहर पहुंचा तो उसे एक टूटा-फूटा-सा मंदिर दिखाई दिया| उस मंदिर में कुछ महीने पहले तक कोई भी पुजारी नहीं रहता था, किंतु कुछ समय से उसमें न जाने कहां से आकर एक पुजारी रहने लगा था| देवदत्त ने जब उस मंदिर में प्रवेश किया, तब वह पुजारी भगवान की मूर्ति के सामने खड़ा हुआ उनकी पूजा-अर्चना में व्यस्त था| देवदत्त वहीं बैठ गया और पुजारी के निवृत होने की प्रतीक्षा करने लगा| कुछ समय पश्चात जब पुजारी पूजा आदि से निवृत हुआ तो उसकी दृष्टि उदास भाव में बैठे देवदत्त पर पड़ी| वह उसके समीप पहुंचा, उसे पूजा का प्रसाद दिया और फिर उसका परिचय पूछा| देवदत्त ने सत्य भाव से पुजारी को सारी बातें बता दी| बातें सुनकर उस पुजारी ने, जिसका नाम जलपाद था, उससे कहा - "पुत्र! बुरे व्यसनी के लिए तो संसार का संपूर्ण धन भी अपर्याप्त होता है, अत: अब तक जो हो चुका है, उसे भूल जाओ और मेरे पास रहकर अपना आचरण सुधारो| मैं तुम्हें 'इष्ट साधना' की विधियां समझा दूंगा| यदि तुमने अपने इष्ट की सिद्धि प्राप्त कर ली तो फिर संसार का समस्त वैभव तुम्हें स्वत: ही प्राप्त हो जाएगा|"

"उसके लिए मुझे क्या करना होगा, श्रीमान?" देवदत्त ने पूछा|

"कठोर साधना और मेरी आज्ञा का पालन|" पुजारी जलपाद ने कहा - "जिस प्रकार मैंने अपनी साधना से भूत-प्रेतों को वश में करके उनसे सिद्धियां प्राप्त की हैं, उसी प्रकार तुम्हें भी कठोर साधना द्वारा सिद्धियां प्राप्त करनी होंगी|"

"तब तो आप मुझे सिद्धि प्राप्त करने की विधि समझा दीजिए| मैं आपकी हर आज्ञा, हर आदेश का पालन करूंगा|" देवदत्त बोला|

"ठीक है| कल रात से मैं तुम्हें साधना करने की विधि समझाऊंगा| इसके लिए तुम्हें कुछ समय तक मेरे समीप ही रहना पड़ेगा|"

अगली रात जलपाद उसे श्मशान के निकट एक वट वृक्ष के नीचे ले गया| वहां उसने मंत्र पढ़कर खीर और नैवेद्य उस वट वृक्ष की जड़ में रखे और खीर और नैवेद्य का कुछ भाग चारों दिशाओं में बिखेर दिया, फिर उसने देवदत्त को भी ऐसा ही करने के लिए कहा| तत्पश्चात जब देवदत्त ने वैसा ही कर दिया तो पुजारी जलपाद ने उससे कहा - "अब तुम इसी भांति पूजा करो और पूजा के दौरान यह कहते रहो - हे देवी विद्युतप्रभा! मेरी पूजा ग्रहण करो|"

उस दिन से देवदत्त जलपाद के पास रहता हुआ उसी की भांति विद्युतप्रभा की आराधना करने लगा| कई दिन की कठिन साधना के बाद आखिर एक रात उस वट वृक्ष का तना फटा और एक दिव्य स्त्री तने से प्रकट हुई| उस दिव्य स्त्री ने देवदत्त से कहा - "युवक! मेरी स्वामिनी तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हैं| उन्होंने तुम्हें दर्शन देने का निर्णय किया है| कृपया मेरे साथ चलो|"

देवदत्त उस दिव्य स्त्री के साथ वट वृक्ष के फटे हुए तने में प्रविष्ट हो गया| वह स्त्री उसे गर्भागार में बने मणि-माणिक्यों से युक्त एक भव्य भवन में ले आई| देवदत्त ने वहां एक रत्नजड़ित सिंहासन पर एक अतीव सुंदरी को बैठे देखा| देवदत्त का स्वागत करते हुए उस सुंदर स्त्री ने कहा - "आओ युवक! इस महल में तुम्हारा स्वागत है| मैं रत्नवर्ष नामक यक्ष की पुत्री विद्युतप्रभा हूं, जिसकी तुम और जलपाद साधना करते रहे हो|"

यह सुनकर देवदत्त श्रद्धापूर्वक उसके सामने नतमस्तक हो गया, फिर वह बोला - "देवी विद्युतप्रभा! आपका दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया| कृपया मेरे योग्य कोई सेवा बताइए|"

"युवक!" विद्युतप्रभा बोली - "जलपाद की आराधना से प्रसन्न होकर तो मैं बहुत शीघ्र ही उसे 'अष्टसिद्धि' देने वाली हूं, लेकिन तुम मुझे बहुत पसंद आए हो, अत: मैं चाहती हूं कि तुम मेरे साथ विवाह करके मेरे साथ ही रहो|"

"यह तो मेरा अहोभाग्य है देवी विद्युतप्रभा!" तत्काल देवदत्त बोला - "मैं प्रस्तुत हूं और आशा दिलाता हूं कि आपकी हर आज्ञा का पालन करूंगा|"

इस प्रकार देवदत्त विद्युतप्रभा से विवाह करके वहीं उसके पास रहने लगा| कुछ समय बाद वह विद्युतप्रभा से आज्ञा लेकर गर्भागार से बाहर निकला और जलपाद के पास पहुंचा| वहां उसने जलपाद को उस पर अब तक बीती सारी बातें बता दीं| सुनकर जलपाद ने कहा - "वत्स! तुमने बहुत अच्छा काम किया है| अब एक काम और करो|"

"वह क्या?"

"किसी भी तरह से उस यक्षिणी का पेट फाड़कर उसका गर्भ ले आओ| यदि तुमने ऐसा करने से इनकार किया तो मैं तुम्हें अपनी सिद्धि शक्ति से भस्म कर दूंगा|"

अनिश्चित एवं दुखी भाव से देवदत्त पुन: विद्युतप्रभा के पास पहुंचा| विद्युतप्रभा अपनी शक्ति से उसके मनोभावों को जान गई| उसने देवदत्त को आश्वासन दिया - "देवदत्त! मैं जान गई हूं कि जलपाद ने तुम्हें विवश करके मेरा गर्भ लाने के लिए भेजा है, ताकि वह उस गर्भ का भक्षण करके असंख्य सिद्धियां प्राप्त कर सकें|"

"हां, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता|" हिचकिचाते हुए देवदत्त ने कहा|

"हिचकिचाओ मत देवदत्त!" विद्युतप्रभा बोली - "आगे बढ़ो और मेरा पेट फाड़कर मेरा गर्भ निकाल लो| मैं तुम्हें ऐसा करने की आज्ञा देती हूं|"

"नहीं देवी विद्युतप्रभा! मैं ऐसा कदापि नहीं कर सकता| चाहे मुझे जलपाद के क्रोध का सामना ही क्यों न करना पड़े|" देवदत्त ने दो टूक स्वर में उत्तर दे दिया|

तब विद्युतप्रभा ने स्वयं ही अपना पेट फाड़कर अपना गर्भ निकाला और उसे देवदत्त को देकर कहा - "देवदत्त! लो इस गर्भ को ले जाओ, जो भी कोई व्यक्ति इस गर्भ का भक्षण कर लेगा, वह सिद्ध विद्याधर हो जाएगा| पूर्व काल में मैं स्वयं भी एक विद्याधरी थी, लेकिन एक शाप के कारण मुझे यक्षिणी की योनि में जन्म लेना पड़ा| अब मेरे उस शाप का अंत हो गया है| अब मैं पुन: अपने विद्याधर लोक को लौट रही हूं|"

ऐसा कहकर विद्युतप्रभा लोप हो गई| व्यथित हृदय से देवदत्त विद्युतप्रभा के गर्भ को लेकर गर्भागार से बाहर निकल आया और वह गर्भ लाकर जलपाद को सौंप दिया|

जलपाद विद्युतप्रभा का गर्भ पाकर प्रसन्न हो गया| वह देवदत्त से बोला - "वत्स! अब जल्दी से जंगल में जाकर लकड़ियां चुन लाओ| मैं इस गर्भ को आग में भूनूंगा| भुन जाने पर दोनों प्रसाद रूप में इसे ग्रहण करेंगे| प्रसाद खाते ही हम दोनों असंख्य सिद्धियों के स्वामी बन जाएंगे|"

"गुरुदेव!" देवदत्त बोला - "मैं इस घृणित कार्य में आपका सहयोग नहीं कर सकता| पहले तो आपने यही घृणित कार्य किया कि मेरे द्वारा देवी विद्युतप्रभा, जिसकी आप इतने दिन तक आराधना करते रहे, उसका गर्भ लाने के लिए मुझे विवश किया और जब उस देवी ने कृपाकर स्वयं ही तुम्हारी स्वार्थ सिद्धि के लिए गर्भ निकालकर दे दिया तो अब आप उसे भूनकर खाने की बातें कर रहे हैं| मैं तो यह घृणित कार्य करने के लिए हरगिज भी तैयार नहीं हूं|"

यह सुनते ही क्रोध से जलपाद की आंखें जलने लगीं| उसने देवदत्त की ओर लाल-लाल आंखों से देखते हुए कहा - "देवदत्त! मैंने जो कुछ कहा है, तत्काल उसका पालन करो, अन्यथा मैं तुम्हें अभी यमलोक पहुंचा दूंगा|"

मरता क्या न करता! मृत्यु के भय से देवदत्त तत्काल लकड़ियां चुनने के लिए जंगल में चला गया| जब वह लकड़ी लेकर जंगल से लौटा तो उसने जलपाद को वहां से गायब पाया| देवदत्त समझ गया कि जलपाद ने उसके साथ धोखा किया है| जंगल से लकड़ियां लाने का तो एक बहाना था| दरअसल जलपाद उसे किसी तरह वहां से दूर भेजना चाहता था, ताकि अकेला ही विद्युतप्रभा के गर्भ को पकाकर उसे खा सके और वह अपने उस उद्देश्य में कामयाब भी हो चुका था|

यह सब जानकर देवदत्त के मन में जलपाद के प्रति घृणा पैदा हो गई| उसने निश्चय कर लिया कि जलपाद की इस धूर्तता की सजा वह उसे अवश्य देगा| तब उसने अपने अभीष्ट महोप्रेत को सिद्ध करने का निश्चय कर लिया| वह फट वृक्ष के नीचे बैठ गया और मंत्र पढ़-पढ़कर अपने शरीर का काफी मांस काटकर महाप्रेत का आह्वान करने लगा| इस प्रकार जब वह अपने शरीर का मांस प्रेतराज की भेंट चढ़ा चुका तो उसके कृत्य से प्रसन्न होकर महाप्रेत प्रकट हुआ| उसने कहा - "देवदत्त! अब बस करो| अब और अपना मांस काटकर मेरा आह्वान करने की आवश्यकता नहीं है| मैं तुमने प्रसन्न हूं| बोलो क्या चाहते हो?"

देवदत्त बोला - "हे प्रेतराज! जलपाद ने मेरे साथ छल किया है| उस पापी ने देवी विद्युतप्रभा का गर्भ लाने के लिए पहले तो मुझे माध्यम बनाया और जब मेरी विवशता जानकर देवी विद्युतप्रभा ने मुझ पर कृपा कर स्वयं ही अपना गर्भ निकालकर मुझे दे दिया तो जलपाद स्वयं उस गर्भ से सिद्धि प्राप्त करके न जाने कहां चला गया| मैं उससे उसके इस दुष्कर्म का बदला लेना चाहता हूं, प्रेतराज! बताओ, वह पापी कहां है?"

प्रेतराज ने अपनी अंतर्दृष्टि से देखकर बताया - "देवदत्त! जलपाद इस समय विद्याधर लोक में विद्युतप्रभा के महल में है और देवी विद्युतप्रभा से अपना प्रेम स्वीकार कर लेने का आग्रह कर रहा है|"

"तब तो मुझे तुरंत विद्याधर लोक पहुंचना चाहिए|" देवदत्त व्यग्रता से बोला - "हे प्रेतराज! मुझे तुरंत विद्याधर लोक पहुंचाओ|"

महाप्रेत के कंधों पर बैठकर देवदत्त आकाश मार्ग से विद्याधर लोक में पहुंचा| महाप्रेत ने उसे देवी विद्युतप्रभा के महल में प्रांगण में उतार दिया और अदृश्य रूप में एक ओर खड़ा हो गया|

जलपाद उस समय राजसी वस्त्र पहने विद्युतप्रभा से अपनी पत्नी बन जाने का आग्रह कर रहा था और विद्युतप्रभा बार-बार उससे इन्कार कर रही थी| तब पापी जलपाद उससे बलात्कार करने के लिए उद्धत हो गया| विद्युतप्रभा उसकी पकड़ से छूटकर इधर-उधर भागने का प्रयास करने लगी, तभी उसकी नजर देवदत्त पर पड़ी और वह जोर से चिल्ला पड़ी - "देवदत्त! मुझे इस पापी से बचाओ| यह दुष्ट मेरे साथ बलात्कार करने की चेष्टा कर रहा है|"

बस फिर क्या था| देवदत्त की आंखों में खून उतर आया| उसने विद्युतप्रभा को एक ओर किया और जलपाद से भिड़ गया| दोनों में द्वंद्व युद्ध होने लगा, लेकिन कुछ ही देर में देवदत्त की शक्ति जवाब देने लगी| असीम सिद्धियां प्राप्त किए हुए जलपाद के सम्मुख वह पस्त पड़ने लगा|

यह देखकर महाप्रेत उसकी मदद के लिए उपस्थित हुआ| उसने जलपाद की वह चमत्कारी तलवार देवदत्त को दे दी, जिसमें जलपाद की समस्त सिद्धियां समाहित थीं| महाप्रेत ने फुसफुसाकर देवदत्त के कान में कहा - "देवदत्त! यह चमत्कारी तलवार जलपाद की जान है| जब तक यह इसके अधिकार में रहेगी, यह अजेय रहेगा| विश्व की कोई शक्ति इसका मुकाबला नहीं कर पाएगी, अत: अब तुम इसी के शस्त्र से इसका विनाश कर डालो| याद रखो, भूलकर भी यदि तलवार तुम्हारे अधिकार से बाहर चली गई, तब तुम्हारे साथ-साथ मेरा भी विनाश निश्चित है, क्योंकि अपनी मायावी अंतर्दृष्टि से जलपाद मुझे भी देख चुका है|"

चमत्कारी तलवार हाथ में आते ही देवदत्त में बल का संचार हो गया| वह पूरी शक्ति से जलपाद से जा टकराया, फिर देखते-ही-देखते उसने जलपाद को परास्त कर दिया| भूमि पर पड़े जलपाद की गर्दन पर तलवार की नोंक जमाए जब वह उसका वध करने ही वाला था, तो एकाएक विद्युतप्रभा चिल्लाई - "नहीं देवदत्त! यह अधर्म का कार्य मत करना| जलपाद ब्राह्मण है| यदि तुमने इसका वध कर दिया तो तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप लग जाएगा| इस स्थान पर महामाई पार्वती निवास करती हैं| तुम्हारे द्वारा इसकी हत्या हुई तो वे अप्रसन्न हो जाएंगी और तुम्हें शाप दे देंगी, अत: अपनी तलवार इसकी गर्दन से हटा लो|"

विवश होकर देवदत्त ने अपनी तलवार की नोंक जलपाद की गर्दन से हटा ली| यह देखकर महाप्रेत बोला - "देवदत्त! अब इस तलवार का स्पर्श इसके मस्तक से करो| ऐसा करते ही इसकी शेष शक्तियां भी इस तलवार में समाहित हो जाएंगी| तब यह एक असहाय व्यक्ति बनकर रह जाएगा| तब सभी शक्तियां छिन जाने के कारण यह तुम्हारा कोई भी अहित नहीं कर पाएगा|"

देवदत्त ने वैसा ही किया| शक्तियां छिनते ही जलपाद एक सामान्य आदमी बन गया| तब देवदत्त ने उससे कहा - "दुष्ट जलपाद! मैंने तुझे गुरु मानकर तेरी अभ्यर्थना की, जैसा तुने निर्देश दिया, उसके अनुसार काम करके तेरा अभीष्ट सिद्ध किया, किंतु तूने मेरे साथ ही धोखा किया, जी तो चाहता है कि अभी तेरा वध कर दूं, किंतु मैं देवी विद्युतप्रभा को वचन दे चुका हूं कि तेरा वध नहीं करूंगा, किंतु मैं भी तेरी ही तरह एक ब्राह्मण हूं| मैं तुझे शाप देता हूं कि तू मृत्युलोक में जाकर नाना प्रकार के कष्ट भोगता हुआ अपना शेष जीवन व्यतीत करेगा| कोई भी तेरा हितचिंतक, तेरा मित्र तेरी सहायता के लिए नहीं आएगा| एक घृणित व्यक्ति की भांति सभी तुझे दुत्कारेंगे, वे तेरे शरीर को छूने से भी कतराएंगे| तू किसी खुजली हुए कुत्ते की भांति तिल-तिलकर अपने प्राण त्यागेगा|"

देवदत्त ने शाप से जलपाद तत्काल विद्याधर लोक से नीचे गिरता चला गया, तभी वहां महामाता पार्वती प्रकट हो गईं| वह देवदत्त से बोलीं - "हे ब्राह्मणपुत्र! जलपाद का वध न करके तुमने मेरे इस पवित्र स्थान की मर्यादा का मान बढ़ाया है| मैं अपने लोक में रक्तपात को कभी पसंद नहीं करती| मैं तुम्हारे इस कृत्य से बहुत प्रसन्न हूं| तुम जो भी वर मांगना चाहते हो, मांग लो| मैं तुम्हें कैसा भी वर देने के लिए प्रस्तुत हूं|"

तलवार भूमि पर फेंक देवदत्त महामाता पार्वती के चरणों में गिर पड़ा| वह करुण स्वर में बोला - "हे मां जगतजननी| आज आपका दर्शन पाकर मेरा तो जीवन धन्य हो गया| हे माता! आप तो अंतर्यामी हैं| सारे विद्याधर आप ही को अभीष्ट मानकर आपकी आराधना करते हैं| आज आपने सशरीर प्रकट होकर मुझे दर्शन दिए, यही मेरे लिए बहुत है| आपका दर्शन पाकर कुछ और मांगने की मेरी इच्छा ही शेष नहीं बची है| अब मैं और क्या मांगूं?"

"फिर भी पुत्र! तेरी क्षमाशीलता से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें कुछ-न-कुछ दूंगी अवश्य!" माता पार्वती बोलीं - "आज से मैं तुम्हें इस विद्याधर लोक का राजा नियुक्त करती हूं| आज से इस लोक पर तुम्हारा शासन होगा|"

देवदत्त को ऐसा आशीर्वाद देकर मां पार्वती अंतर्धान हो गईं|

मां पार्वती की इच्छानुसार देवदत्त विद्याधर लोक का राजा बन गया| तब उसने विधिवत विद्युतप्रभा के साथ विवाह रचाया और दोनों सुखपूर्वक वहां रहने लगे| देवी मां का दर्शन पाकर महाप्रेत भी प्रेतयोनि से मुक्ति पा गया और विद्याधर बनकर मां पार्वती के बसाए विद्याधर लोक में निवास करने लगा| इस प्रकार देवदत्त की क्षमाशीलता ने उसकी जीवनचर्या ही बदल दी| अनेक वर्ष तक विद्याधर लोक में रहने के कारण वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गया| जब उसका अंत समय आया तो देवदूत उसे लेने के लिए स्वयं आए| देवदत्त को स्वर्ग में स्थान मिला|

Friday, April 11, 2014

मेरी यात्रा गुडगाँव से [उदयपुर वाटी - खंडेला ( माता चामुंडा मंदिर ) राजस्थान ] - Mata Chamunda Mandir Khandela Rajasthan

मेरी यात्रा गुडगाँव से [उदयपुर वाटी - खंडेला ( माता चामुंडा मंदिर ) राजस्थान ] - Mata Chamunda Mandir Khandela Rajasthan



आपबीती - भाग १

अप्रैल २०१३ की बात है ... मेरी एक दोस्त जो की अपनी बहुत सारी पारिवारिक और शारीरिक समस्यायों से जूझ रही थी . साथ ही उसका ये मानना था कि अप्रैल २०१३ में उस पर किसी ने काला जादू या तंत्र मंत्र का प्रयोग करवा दिया था ..... के चलते मैंने उससे वादा किया कि उसकी सारी समस्याओं का समाधान दूंगा मैं उसे ..... वो राजस्थान के जयपुर से सम्बन्ध रखती थी ... और उसका मानना था कि रात्रि में १२ मध्यान्ह के बाद कोई व्यक्ति साक्षात् आकर उसके बिस्तर पर बैठ जाता है और तत्पश्चान उसके शरीर पर हावी हो जाता है .... मैं सोचा कि देखता हूँ क्या बात है और कौन है जो ऐसा करता है जबकि मेरी वह मित्र खुद भी मातृ शक्ति कि उपासिका थी ... इसके बाद भी ऐसी समस्या बहुत मायने रखती है ... मैंने सोचा कि कैसे उस शक्ति से बात करूँ जिससे मुझे ये पता चल सके कि आखिर वह शक्ति है कौन और कितने पानी में है . मैंने अपनी चालें चलनी शुरू की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ .... मैं कोशिश करता और किसी भी वक्त उस ताकत को खींच कर उस मित्र के शरीर पर बुला तो लेता था लेकिन इसके बाद असमर्थ हो जाता ... सिर्फ उसकी तेज सांसे और दर्द से भरी आहें ही मेरे कानो तक पहुँच पाती थी .... उसे बोलने पर मजबूर नहीं कर पा रहा था मैं . आखिर कर उसने ये बात अपने घर वालों को भी बतायी जिसकी वजह से उसके घर वाले उसे किसी हनुमान जी के सिद्ध मंदिर पर ले गए वहाँ के पुजारी जी ने भरसक कोशिश की और उस शक्ति ने वायदा तक कर लिया पुजारी जी से लेकिन सरे वायदे झूठे हो गए वह फिर वापस आ जाता था .... थक हार कर पुजारी जी ने एक महीने के बाद बोल दिया की अब ये मेरे बस की बात नहीं है .... आप कहीं और दिखा लो .... मैं भी मजबूर था क्योंकि मैं उसके सामने नहीं था और किन्ही अपरिहार्य परिश्थिति की वजह मैं भी उस तक नहीं पहुँच सकता था... मैंने थक हार कर उसे सलाह दी की तुम ... मेंहदीपुर बाला जी धाम पहुँचो ... मैं भी वहीँ पहुँच जाउंगा ... इस सारे क्रम में जिस दिन का समय निर्धारित हुआ था उसने सारी तैयारियां कर लीं ... लकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था ..... उससे एक दिन पहले उसके घर के एक सदस्य को बहुत तेज दौरा पड़ा ... आनन् फानन में अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉ. ने परामर्श दिया की इन्हे भर्ती करवाना पड़ेगा अन्यथा कुछ भी हो सकता है यहाँ तक की इनकी जान भी जा सकती है ...! उसका वहाँ पहुंचना अधर में फंस गया लकिन मैं फिर भी तैयार हुआ .. की मैं अकेले ही जाउंगा गुरु दरबार में ... लकिन ये बात मैंने उससे नहीं बतायी और मैं निकल गया ...... ! उसी समय जब मैं रास्ते में था तो उसका फोन आया मेरे पास और कहने लगी - " मेरी वजह से आप सब लोगों को बहुत सी परेशानियां झेलनी पड रही हैं - मेरे घर में सब बहुत परेशान हैं - इसलिए मैंने फैसला किया है कि मैं कल सुबह घर छोड़ दूंगी " - मैं अचकचा गया कि यह तो सब उल्टा हो रहा है - यदि इसने घर छोड़ा तो जिस प्लान के साथ मैं मेंहदीपुर जा रहा हूँ अधर में फंस जायेगा - मैंने उसे बहुत समझाया कि " कोई परेशान नहीं है तुम्हारी वजह से - हम सब लोग बस अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं - और अपनों के लिए परेशान होना या समस्या का समाधान निकालना हम सबका कर्तव्य है "!

उसने तो जैसे निश्चय ही कर लिया था - मेरी किसी बात का कोई पड़ रहा था उसके ऊपर मैंने लाख कोशिशें कीं लेकिन असफल और तभी नेटवर्क फेल हो गया इसके बाद जब तक मैं वहाँ नहीं पहुंचा उसका फोन लगाता रहा लेकिन नहीं लगा -!

सुबह ४ बजे मैं मेंहदीपुर पहुँच गया सारे नियमों और मान्यताओं को पूरा करने के बाद मैं दर्शन के लिए लाइन पर लग गया और उस आसुरी शक्ति का आवाहन किया जिससे कि वह मेरे साथ ही प्रांगड़ के अंदर एक बार आ जाये तो फिर उसका अंत कोई नहीं रोक सकता - और मैं अपने इस प्रयास में सफल भी रहा - लेकिन शायद समय कुछ और चाहता था - जैसे ही उसके समापन के अंतिम चरण के पास ही था मैं कि मेरी उस दोस्त कि छोटी बहन का फोन आ गया मेरे पास कि उसकी दीदी घर छोडकर चली गयी - इस बात से अचानक मुझे झटका सा लगा और मेरे मुंह से अचानक निकला कि " अगर उसने मेरी बात नहीं सुनी तो तुम आजाद हो " और बस वह निकल भगा -!

मैं परेशान भी था और पछता भी रहा था कि ये कैसी गलती हो गयी मुझसे - लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था क्योंकि मैंने खुद ही गलती से उसे आजाद कर दिया था - इसके बाद खाली हाथ वापस मैं - उसके घर में भी सब परेशान और मैं भी परेशान क्योंकि एक हफ्ता होने को था उसकी कोई खबर नहीं थी - इसी बीच मैंने अपने परिचित एक संत से संपर्क किया और उनसे कहा कि ऐसी परिस्थिति है - आप कुछ भी करो लेकिन मुझे या तो उसका पता चाहिए या फिर उस तक पहुँचने का कोई और जरिया -!

आपबीती - भाग २


उन्होंने मुझसे वादा किया कि आज से लेकर कल शाम तक में वह खुद तुम्हे संपर्क करेगी और आश्चर्य कि बात कि उसी दिन शाम में उसका एक सन्देश आया कि - वह अपनी किसी सहेली के घर में हैं और मैं ये बात किसी को न बताऊँ - क्योंकि ये बात अगर खुल गयी तो उसके घर वाले उसे घर ले जायेंगे और वह इस समस्या से कभी छुटकारा नहीं पास सकेगी -!

मैंने भी उसे वापसी सन्देश दे दिया कि - वह निश्चिंत रहे मैं उसके बारे में किसी को नहीं बताऊंगा - लेकिन वह मुझे यह बता दे कि वह है कहाँ पर और क्या करने वाली है ?

उसका सन्देश आया कि वह उदयपुर वाटी में कोई कोई बहुत मशहूर मंदिर है माता चामुंडा का वहीँ पर है -!

मेरे लिए इतना काफी था क्योंकि उसको परेशां करने वाली नकारात्मक शक्ति जो थी वह ऐसी थी जिसने हद से ज्यादा मुझे भी बेइज्जत किया था और मुझे पता था कि अब उसका अंत समय आ गया है - !

उसी रात जब मैं सोया तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे कोई दिव्य औरत मेरे सामने खड़ी है और कह रही है " यदि सारा सच जानना चाहते हो तो उदयपुर वाटी पहुँचो "

मैंने उसी समय सोच लिया कि मैं कल ही निकल जाउंगा सुबह उठाकर मैंने सबसे पहले अपने ऑफिस फोन किया कि मैं २ दिन कि छुट्टी पर रहूँगा - इस बात पर मेरे सीनियर से बहस हो गयी - उसका कहना था कि ऐसे अर्जेंट छुट्टी के लिए कोई प्रावधान नहीं होता - मैंने उसे बोला कि मैं छुट्टी पर हूँ तो हूँ - वापस आउंगा तब बात करेंगे -!

और ऐसा कहकर मैं वहाँ के लिए निकल पड़ा -!

जब मैं उदयपुर वाटी पहुंचा तो वहाँ पूछने पर पता चला कि कि वहाँ कोई चामुंडा माता का मंदिर है ही नहीं हाँ वहाँ से थोडा दूर खंडेला नाम कि जगह है वहाँ जरुर माता का मशहूर मंदिर है और ऊपरी हवाओं से ग्रस्त लोग वहाँ जाते हैं ( इस बीच अपरिहार्य कारणों से उसका मेरा कोई संपर्क नहीं हो पाया था )

मैं उदयपुर से खंडेला के लिए निकल पड़ा - खंडेला पहुंचकर मैंने फोन देखा तो उसका सन्देश पड़ा हुआ था जिसमे उसने लिखा था " यहाँ चारों तरफ बस पहाड़ ही पहाड़ हैं हर तरफ हरियाली है - बहुत अच्छा लग रहा है - मन करता है कि हमेशा के लिए यहीं रह जॉऊँ - और हाँ जब घर में थी तो वहाँ पानी के लिए तरसते थे कि अ बरसेगा तब बरसेगा तो गर्मी होगी लेकिन यहाँ तो दिन में कई कई बार पानी बरस जाता है - पूजा करने में भी माँ कि बहुत मजा आ रहा है - बहुत मानसिक शांति मिलती है - हम लोग मेरी सहेली के घर पर रुके हुए हैं लेकिन घर मैं सिर्फ खाना खाने जाती हूँ बाकी का पूरा समय माँ के मंदिर में ही गुजर जाता है "-!

मैं लगभग शाम के ४ बजे वहाँ पहुँच गया था - लेकिन मैंने उसे नहीं बताया कि मैं खुद भी वहीँ हूँ - बस उससे इतना पूछा अगले सन्देश में कि " मदिर में शाम को कितने बजे तक होती हो तुम " ?

उसने वापस सन्देश भेजा कि रात ०९ :३० तक - वहाँ पहुंचकर एक धरमशाला में पहले ठहरने का इंतजाम किया मैंने और इसके बाद वहाँ के कुछ स्थानीय लोगों से मंदिर और उसकी दुरी के बारे में पता किया तो पता चला कि यहाँ से डेढ़ या दो किलोमीटर दूर होगा और फिर पहाड़ के ऊपर जाने में लगभग इतना ही टाइम लगेगा - मैंने अंदाज लगाया कि किसी भी हाल में अगर मैं अभी निकल जाऊं तो ०८:३० तक पहुँच जाउंगा क्योंकि तब तक लगभग ५ बज चुके थे - अचानक से बरसात शुरू हो गयी तो धरमशाला के मालिक या स्टाफ जो भी कहें उन्होंने मुझे सलाह दी कि कल सुबह मंदिर चले जाना क्योंकि अभी पानी बरसना शुरू हो गया है और रास्ता सही नहीं है - लेकिन भला मैं कहाँ मानने वाला था तो अंततः उन्होंने एक छतरी दे दी मुझे और मैं निकल गया -!

आपबीती - भाग ३

जब मैं मंदिर के ट्रस्ट गेट के पास पहुंचा तो शाम के ०६:३० हो चुके थे पानी कम होने के बजाय और तेज हो गया था - नीचे बैठे पंडित से जब मैंने पूछा तो उसने जवाब दिया कि ऊपर पहुँचने में लगभग एक घंटा या डेढ़ घंटा लगेगा - लेकिन तुम रास्ते से जाने के बजाय पत्थरों को फलांगते हुए निकल जाओ तो जल्दी पहुँच जाओगे - इसके बाद मैंने संक्षिप्त रास्ते का चयन किया और पत्थरों पर कूदते - फलांगते हुए आगे बढ़ा - लेकिन कोई आधे घंटे का सफ़र ही तय किया होगा कि प्यास ने जोर करना शुरू किया - कुछ देर तक तो बर्दाश्त करता रहा - लेकिन कुछ देर बाद ऐसा लगने लगा कि जल्दी ही यदि पानी न मिला तो शायद आज प्राण नहीं बचेंगे - !

कितनी बेबसी महसूस कर रहा था मैं इसके बारे में अगर आज सोचता हूँ तो लगता है कि जैसे वह कोई सपना मात्र था - चारों तरफ घनघोर बारिश - पहाड़ से बहने वाला पानी ऐसा लग रहा था जैसे कि सारे नदी हुए हों तेज आवाज - सारे कपडे भी भीगे हुए थे लेकिन पीने के लिए एक बूंद पानी नहीं - इतने बारिश और ठन्डे मौसम के बाद भी मुझे चक्कर आने लगे और ऐसा महसूस हो रहा था कि बस अभी कदम साथ छोड़ देंगे - टाँगें मुड़ जाएँगी और यहीं किसी पत्थर से मेरा पैर फिसलेगा और फिर हमेशा के लिए मेरी जीवन लीला का अंत हो जायेगा - बस इस विचार मात्र ने उस घडी में मुझे सिर्फ इतना अहसास दिलाया कि मरना तो आज तय है लेकिन एक कोशिश मुझे चाहिए मुख्य रास्ते तक पहुँचने कि - क्योंकि यहाँ मरने का मतलब ये कि किसी को मेरी लाश तक नहीं मिलेगी - क्योंकि मैं शायद रास्ता भटक गया था - इतना सोचकर और अपनी मौत निश्चित मानकर मैंने फिर से अपनी खोयी हुयी ताक़त बटोरकर बस जिधर मुख्य रस्ते कि सीढ़ियां दिख रही थीं उधर दौड़ लगा दी -!

पहुँच गया मैं मुख्य रस्ते पर लेकिन अब आगे जाने कि हिम्मत नहीं बची थी - छतरी खोली और वहीँ बैठ गया - उस शाम अपनी बेबसी पर रो दिया वहीँ बैठे - बैठे मैं -! इसके बाद मुझे खुद भी पता नहीं कि क्या हुआ और कब मेरे ऊपर बेहोशी छा गयी - जब होश आया तो देखा कि मैं जमीन पर सीधा लेटा हुआ हूँ - और छतरी कि जो ढेर साडी डंडियां होती हैं उनमे से एक डंडी मेरे मुंह के अंदर पड़ी हुयी है जिससे होता हुआ पानी मेरे मुंह के अंदर जा रहा है - पता नहीं कितना पानी ऐसे पिया होगा मैंने लेकिन प्यास में कोई कमी नहीं आयी थी - लग रहा था कि ये बारिश का पूरा पानी पि जाऊं मैं - लेकिन अब कोशिश कि तो पैर साथ दे रहे थे - खड़ा हुआ तो हो गया लेकिन पैरों में कंपकपाहट हो रही थी - फिर भी ये सोचकर कि अब अगर एक बार बच गया हूँ तो अब नहीं मरूंगा - इसलिए कुछ भी हो जाये अब माँ के दरबार तक पहुंचना ही है - रास्ता जगह - जगह से कटा हुआ था - उजाले का कोई साधन नहीं जो बिजली चमकती थी उसी से दूर तक रास्ता दिख जाता था इसके बाद फिर घटाटोप अँधेरा - इसी बीच पाइप लाइन दिखी जो ऊपर मंदिर तक जा रही थी इसलिए उम्मीद बढ़ने लगी थी कि ऐसी पाइप लाइन्स अक्सर बीच में कहीं न कहीं से लीक होती हैं और वहाँ से पानी जरुर मिल जायेगा बहता हुआ पीने भर के लिए लेकिन आगे जाकर पाइप लाइन फिर मुख्य रस्ते से हटकर अलग हो गयी थी सो मेरा ये सोचना भी गलत साबित हुआ !

थोड़ी ही दूर और चला होऊंगा की अचानक एक ठोकर सी लगी पैरों में और मैं उलटी दिशा की तरफ गिरा - एक दर्द की लहर सी दौड़ गयी शरीर में - इतनी चोट लगी की फिर से आंसू निकल आये क्योंकि बात तो कि पत्थरों के ऊपर गिरा और दूसरी बात ये की पानी बरसने की वजह से पूरा शरीर और कपडे सब पानी से लथपथ - अब तो चोट से करवट बदलना भी मुश्किल हो रहा था - बेबसी से थोड़ी देर वैसे ही पड़ा रहा और रोता रहा फिर हिम्मत करके अपनी जगह पर बैठ गया तभी बिजली चमकी जोरों से और सामने की हालत देखकर मेरा मुंह और सूख गया -!

मुख्य रास्ता कटा हुआ हुआ था - और नीचे गहरी खाई दिख रही थी - अगर गिरा नहीं होता और सीधे उसी रास्ते में चार कदम और बढ़ाये होते तो कटे हुए रास्ते की खायी में गिर गया होता - अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया " जिसकी पालनहार तू हो कोई उसको मार नहीं सकता - लेकिन मैं क्या करूँ मेरे पैर ही नहीं उठते माँ ऐसा लगता है की जिंदगी और हिम्मत बहुत कम हैं और तुझ तक पहुँचने का रास्ता बहुत लम्बा -!

आपबीती - भाग ४

"आज अगर तेरे दरबार तक पहुँच गया तो फिर मैं समझ लूंगा की बिना तेरी मर्जी के काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा "

फिर दोबारा बिजली कौंधी तो इतना असमर्थ होने के बाद भी पैरों में स्प्रिंग लग गए और बस उठा और भाग खड़ा हुआ ( सामने जहाँ रास्ता कटा हुआ था और खायीं नजर आ रही थी वहां से एक नाग निकल रहा था )

ये तो तय था की मौत मेरे हिस्से में है नहीं इसलिए आँखे बंद करके भागा - और भागता ही रहा - कुछ दूर पहुंचकर डर और दुःसाहस दोनों का धुवां निकल गया और फिर से पैर मुड़े कुछ पता नहीं की कहाँ था क्या हुआ - थोड़ी देर बाद जब आँखें खुलीं तो माता के मंदिर के प्रवेश द्वार की ड्यौढ़ी पर पड़ा हुआ था - लेकिन उठकर अंदर जा सकने की हिम्मत नहीं थी - तो बैठे - बैठे ही घिसट के चलना शुरू किया - मंदिर प्रांगड़ के अंदर पहुंचकर फिर थोड़ी देर लेटा रहा - हाँ इस सारे वाकये के दरम्यान मैं रोया बहुत शायद अपनी अब तक की जिंदगी में जितना नहीं रोया उतना इस एक दिन में रो लिया -!

रात के ०८:३० ही हुए थे अभी लेकिन लग रहा था जैसे कि कई सालों से इस सफर और बेबसी में हूँ - १० मिनट लगभग वैसे ही और पड़ा रहा की तभी फिर बिजली चमकी तो दिखा की मंदिर प्रांगड़ में मंदिर की विपरीत दिशा में दो कमरे बने हुए थे और सामने बरामदा था उसके ठीक सामने पानी का नल लगा हुआ था - देख कर जान में जान आई - हिम्मत करके नल तक गया नॉब घुमायी दो चुल्लू पानी निकला उसे पिया तो कुछ आराम महसूस हुआ लेकिन फिर उसके बाद पानी निकलना बंद हो गया - बहुत कोशिश की उलटी - सीधी दोनों तरफ नॉब को घुमाकर कोशिश कर ली लेकिन एक बूंद भी पानी नहीं निकला -!

प्यास थी की और बढ़ रही थी - कम होने के बजाय - बारिश अब भी हो रही थी पूरा शरीर और कपडे सब पानी से लथपथ हो चुके थे - लेकिन अब बेबसी कम महसूस हो रही थी क्योंकि अपने लक्ष्य तक पहुँचने की ख़ुशी भी बहुत थी - मंदिर में जहाँ माँ की मूर्ति स्थापित थी वहां जा पहुंचा - खूब बड़ी से बारादरी और वहां पर स्टील की रेलिंग लगी हुयी थी -! अब ठण्ड भी लग रही थी हवा का बहाव भी बहुत तेज था - फिर भी सारे कपडे उतारे - उनका पानी निचोड़ा और वही रेलिंग में फैला दिया -!

फोन निकाला - देखा तो पूरा फोन भी भीगा हुआ था - पॉवर बटन प्रेस किया तो ऑन हो गया - नेटवर्क भी बहुत डाउन हो रहा था बैटरी सिर्फ २ या पॉइंट थी - फेसबुक ओपन की और उसको एक सन्देश डाला " सीता मैं माता चामुण्डा के मंदिर में पहुँच गया हूँ - सच कहूँ तो जिंदगी और मौत के बीच का फासला आज किस तरह से तय किया है मैंने इसका बहुत अच्छा अनुभव रहा मुझे - मुझे पता है की समय बहुत हो चूका है - मौसम भी ख़राब है - इसलिए तुम आज जल्दी घर चली गयी होगी - अगर संभव हो तो कल जब सुबह यहाँ मंदिर आना तो साथ में पानी लेकर आना - मुझे बहुत प्यास लगी है - लेकिन कहीं पानी नहीं मिल रहा है - अगर सुबह तक तुम्हे जिन्दा मिलूं - ये प्यास अगर मेरी जान ना ले ले - तो ढेर सारा पानी पिऊंगा" -!

आपबीती - भाग ५

( एक खास बात यह की जब से वह घर से निकली थी और जितनी बार भी उसका मुझसे संपर्क हुआ था और उसके सन्देश आये थे वे सब फेसबुक पर ही आये थे - उन्ही संदेशों में उससे कई बार मैंने ये भी कहा था की किसी आपात्कालीन परिस्थिति के लिए अपना कोई कांटेक्ट नम्बर तो दे दो - जिसके जवाब में उसने बस इतना कहा था " जब मैंने घर छोड़ा तो अपना फोन भी उसी घर में छोड़ आई थी - मेरे पास मेरा अपना कोई फोन नहीं है - जिस सहेली के माता - पिता के साथ यहाँ आई हूँ - उन्ही आंटी जी का फोन लेकर उसी पर फेसबुक चलाकर तुम्हे सन्देश भेजती हूँ - लेकिन ये नो. मैं नहीं दे सकती - क्योंकि यह मेरा फोन नहीं है और मैं नहीं चाहती की कल को वो लोग ये कहें - की हमारे फोन नम्बर को मैंने सब को बाँट दिया " अस्तु सभी संदेशों का आदान - प्रदान सिर्फ फेसबुक के माध्यम से ही हो रहा था )

मैं देखता रहा फोन को की अभी वह मेरा सन्देश देखेगी और मुझे वापस जवाब देगी लेकिन आधा घंटा हो गया फोन की बैटरी अब लाल रंग लेने लगी थी - उसका कोई जवाब नहीं आया हाँ एक फोन जरूर आने लगा - बैटरी बिलकुल खत्म न हो इस वजह से मैंने वह फोन कट कर दिया -!

वहीँ मंदिर के प्रांगण में अब लेट गया था मैं चाहता था की नींद आ जाये - मैं सो जाऊं तो इस प्यास से भी मुक्ति मिलेगी और इस बेबसी से भी -!

लेकिन नींद भी तो नहीं आ रही थी -!

लगभग १ बजे रात में उसका सन्देश आया - लेकिन वह सन्देश पढ़कर मुझे कोई सुकून नहीं मिला बल्कि अपने ऊपर ही गुस्सा आने लगा -!

" तुम क्यों आ गए यहाँ -? मैंने तुम्हे मना किया था ना की जब तक मैं इस मुसीबत से मुक्ति न पा लूँ - तब तक तुम मेरे पास भी मत फटकना - मैं नहीं चाहती की जो भी मेरे अपने हैं उनको मेरी मुसीबत की वजह से कोई मुसीबत आये -! मुझे पता था की तुम ऐसा ही कुछ करोगे - यहाँ मंदिर में जो पंडित जी हैं उन्होंने कल शाम में बोला भी था की कोई तुम्हारी तरफ बढ़ रहा है लेकिन जो भी है वो पता नहीं उसका जीवन बचेगा भी या नहीं ? क्योंकि तुम्हारी मुसीबत उसकी जान की ग्राहक बनेगी - राम तुम कल सुबह ही ये जगह छोड़ दो मैं किसी की कातिल नहीं बनना चाहती "

" पता नहीं मुझे इस बला से मुक्ति मिल भी सकेगी या नहीं - अगर मैं मर जाऊं तो तुम ध्यान रखना मेरी छोटी बहन और मे्रे परिवार का - अगर माँ की कृपा से मैं सही हो गयी तो फिर मिलूंगी मैं तुमसे " वैसे अभी तुम हो कहाँ ?

मैने उसको जवाब दिया :- " मैं माता चामुण्डा के मंदिर में हूँ - वहीँ माता के मदिर के दरवाजे के सामने जहाँ स्टील की रेलिंग्स लगी हुयी हैं वहीँ पड़ा हुआ हूँ - बारिश और अँधेरा इतना ज्यादा है की मैं वापस भी नहीं जा सकता "-!

उसका फिर सन्देश आया :- "लेकिन जिस मंदिर में मैं जाती हूँ वह तो किसी पहाड़ पर नहीं है - वह तो ऐसे ही जमीन में बना हुआ है हाँ वहां से पहाड़ शुरू जरूर होता है - तुम कहाँ फंस गए हो " राम " तुम लोग मुझे न चैन से मरने दोगे न जीने दोगे - क्या करूँ अब कहाँ जाऊं मैं - कैसे ढूँढूँ तुम्हे इस रात में " ?

मैंने उसे पुनः जवाब भेजा :- " मेरे लिए परेशान होने की जरुरत नहीं है मैं अपनी माँ के घर में हूँ - मौत भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती - बस तुम कुछ मत करो हाँ बस इतना करना की मुझे अपना पूरा पता भेज दो मैं कल सुबह यहाँ से निकल कर वहां पहुँच जाऊंगा "

उसका जवाब आया :- " मुझे माफ़ करना राम मैं कुछ नहीं जानती इस जगह के बारे में लेकिन यह उदयपुर वाटी में हैं बस इतना पता है मुझे "

मैंने उसे सन्देश भेजा :- " कोई बात नहीं लेकिन तुम अंकल से पूछ लो या आंटी से पूछ लो क्योंकि उनका पैतृक घर है ही यहाँ पर जहाँ तुम लोग रुके हुए हो - वे तो जानते होंगे -"

उसने जवाब दिया :- " नहीं मैं चाहकर भी तुम्हे उस जगह का पता नहीं बता सकती क्योंकि तुम मेरे पास पहुंचोगे तो वह बुरी शक्ति तुम्हारी जान ले लेगी - ऐसा मुझे पहले ही मंदिर के पंडित जी ने बताया है - इसलिए तुम वापस चले जाना "

मैंने बहुत कोशिश की लेकिन उसका मन एक बार भी नहीं पसीजा और अब फोन भी ऑफ हो गया -!

खैर पूरी रात अब माँ के घर में ही गुजारनी थी -!

आपबीती - भाग ६

लेटा - लेटा सारे घटनाक्रमों के बारे में चिंतन करता रहा - तभी ऐसा लगा जैसे की मंदिर के पीछे वाले हिस्से में पत्थरों के ढेर सरे टुकड़े गिरे हों और दीवारों से टकराये हों - मैं उठकर भागा ये देखने की क्या हुआ ?

लेकिन पीछे कुछ भी नहीं था - सारा मैदान वैसा ही पड़ा हुआ था धुल और पेड़ों की पत्तियों से भरा हुआ - कुछ नहीं था वहां मैं वापस आकर लेट गया अपनी जगह पर - बारादरी में लगभग ९ या १० कमरे बने होंगे पूरे सबके दरवाजे बंद थे - माँ के कमरे का भी ताला बंद था - थोड़ी देर बाद ऐसा लगने लगा की जैसे सारे कमरों के दरवाजे टूट जायेंगे - अंदर से दरवाजों की भड़भड़ाहट शुरू हो गयी - हवा की सनसनाहट में लग रहा था - जैसे की कोई मुझसे कह रहा हो की हमे बाहर निकालो - हम बाहर आना चाहते हैं -!

बहुत दिन हुए - कोई नहीं आता यहाँ - तुम कैसे आ गए हो ?

मैं सब सुनता रहा - और लेटा रहा - पता नहीं कब नींद आई जब आँख खुली तो सवेरा हो चूका था - देखा तो सबसे पहले पानी की जरुरत महसूस हुयी फिर से उठा कर गया तो नल की नॉब पर कारीगरी शुरू की लेकिन असफल प्रयास पानी को नहीं निकलना था सो नहीं निकला -!

अब मैंने वहां पर घूमना शुरू किया तो देखा की जहाँ मंदिर का प्रवेश द्वार था उसके बगल से ही पाइप लाइन कटी हुयी है और अलग पड़ी है - मतलब ये आशा खत्म हो गयी की यहाँ पानी भी मिल सकता है - हैरत की बात थी - अगर पानी की पाइप लाइन कटी हुयी है और देखकर ऐसा लग रहा था की काफी दिन से कटी हुयी होगी क्योंकि पाइप जहाँ से कटा हुआ था वहां बहुत जंग लगा हुआ था -

"तो फिर वह दो चुल्लू पानी जो निकला था वह कहाँ से आया था" ?

माँ की महिमा माँ ही जाने - फिर मैं वहीँ बैठकर इंतजार करने लगा की शायद अभी थोड़ी देर में लोग आएंगे यहाँ - या तो फिर पुजारी ही आएगा पूजा करने सुबह की - और तब मुझे पीने के लिए पानी मिल जायेगा - दूसरी आशा यह भी थी की " सीता " खुद ही आएगी - क्योंकि हो सकता है उसने मुझसे झूठ कहा हो की वह इस मंदिर में नहीं आती - जिसकी वजह से मैं वापस चला जाऊं - लेकिन अब तो फोन भी ऑन नहीं है सो उसे पता भी नहीं चलेगा की मैं यहाँ से गया हूँ या नहीं - और वह आएगी अपने डेली नियमानुसार और मैं उसे बोलूंगा की " देखो आखिर मैंने तुम्हे ढूंढ ही लिया ना " ?

आपबीती - भाग ७

दिन के ९ बजे तक वहां ही रहा लेकिन उस मंदिर में न तो कोई पुजारी पहुंचा न कोई और जानवर तक पहुंचा - जानवरों के पहुँचने का तो सवाल ही नहीं उठता क्योंकि नीचे से मंदिर तक ऊंचाई कम से कम डेढ़ किलोमीटर से ज्यादा ही होगी - अंततः थक - हारकर मैंने ९ बजे वहां से वापस आने का फैसला किया - वापस आने पर मैं देख रहा था की मंदिर जाने वाला मुख्य रास्ता इतनी जगह से टुटा - फूटा हुआ है की - मुझे खुद नहीं पता की रात में इन खाइयों में क्यों नहीं गिरा मैं ?

बहरहाल लगभग ११:३० पर मैं नीचे धरती पर पहुंचा - तो सामने लगे हुए नल में जी भरकर पानी पिया और वहां से अपने धर्मशाला के लिए निकला - !

धर्मशाला पहुंचकर मैंने फोन चार्जिंग में लगाया - नह धोकर आया - फोन ऑन किया तो उसके दो सन्देश पड़े हुए थे उनका जवाब दिया और फिर एक बार रिक्वेस्ट की मुझे अपना सही पता बता दो - लेकिन उसने नहीं बताया - हाँ एक कसम जरूर दे दी -!

" तुम्हे तुम्हारी माँ चामुण्डा की कसम है तुरंत वापस चले जाओ - अगर नहीं गए तो तुम्हे कुछ हो या न हो हां मैं यहाँ के किसी पहाड़ से कूदकर शाम तक आत्महत्या जरूर कर लुंगी "

और मैं वहां से वापस चल पड़ा -!

( मेरी इस कहानी में मैं अपने उन सभी मित्रों से एक ही निवेदन करना चाहूंगा जो भी राजस्थान से सम्बंधित हैं - यह आप सब लोगों की जिम्मेदारी भी है की उस मंदिर के ट्रस्ट से संपर्क करें - ऐसा कैसे हो सकता है की मंदिर में नीचे बैठे हुए लोग जिन्हे पूजा करने के लिए रखा गया है वे तिलक लगाकर अपने आपको सजा सवाँर कर बैठे हुए हैं - ट्रस्ट ने वहां फ्रीजर लगवाया हुआ है - फ्रीज़र का पानी पी रहे हैं लेकिन जिसकी वजह से उनको ये सब सुविधाएँ मिली हैं - वह ऐसे ही पड़ी हुयी है उसको न कोई पूछने वाला है - ना बंद मंदिर का ताला खोलने वाला है - यही सारी अनियमितताएं कल को उस सारे इलाके में कोई कहर ढाएंगी तो लोग ईश्वर को दोष देकर इतश्री कर लेंगे वहां की आंतरिक गतिविधियाँ कोई नहीं जानता -!)

जय माँ चामुण्डा
जय माँ महाकाली  


Saturday, February 15, 2014

साधक बनाम साधन - Sadhak Banaam Sadhan



साधक बनाम साधन - Sadhak Banaam Sadhan


बहुत पुराने समय कि बात है किसी राज्य में जयद्रथ नाम के एक प्रतापी राजा हुआ करते थे - धर्मात्मा इतने कि शेर और बकरी एक घाट में पानी पीते थे ----!

उनके राज्य में सारी प्रजा एक सामान अधिकारों को प्राप्त थी किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं था ----  बस सिर्फ एक ही कमी थी राजा के अंदर उन्हें नृत्य और विलास बहुत प्रिय थे -- लेकिन इसे भी बुरा नहीं कहा जा सकता था क्योंकि यह रजोगुण का एक हिस्सा है --!

एक दिन दरबार में एक नट आया उसने राजा को प्रसन्न करने के उद्देश्य से बहुत से आश्चर्यजनक खेल दिखाए जिनसे राजन बहुत प्रभावित हुए और उस नट से उसके खेल के भेद खोलने का आग्रह किया --- लेकिन नट ने स्पष्ट मन कर दिया और कहा कि राजन यही मेरी रोजी है मैं प्राण अर्पित कर सकता हूँ आपके एक आदेश पर किन्तु इस विद्या के भेद जाहिर करने की जिद न करें ---!

राजा  आखिर थे तो राजा ही राजहठ जाग गया और आज्ञा कि अवहेलना के अपराध में नट को बंदी बना लिया गया कारगर में तरह तरह कि यातनाओं के बीच नट से भेद जानने कि कोशिश कि गयी --- लेकिन नट भी अपने कौल और निश्चय का पक्का था 

एक दिन राजा  जयद्रथ खुद उसके पास पहुंचे और नतमस्तक हो गए खुद ही उसकी हथकड़ी और बेड़ियां खोल दी और उसके चरणो को अश्रुधारा से धोने लगे --- अपने सरे कृत्यों के लिए क्षमा मांगी -!

नट भी संत ह्रदय था ---राजा पर दया आ गयी उसके सरे गुनाह और ज्यादतियां भूल गया और राजा को उठाकर सीने से लगा लिया !

राजा ने सोचा कि अब मैं नट के ह्रदय के नजदीक हूँ अब जो मांगूंगा वह मिलेगा समभवतः ---! राजा ने कहा -- " हे नट सम्राट मैं आपको गुरु स्वीकार करना चाहता हूँ "

नट का ह्रदय गदगद हो गया क्योंकि अब तक जो भी उसे मिला था सिर्फ धन के बदले उसकी कला का प्रदर्शन चाहता था लेकिन व्यक्तिगत जीवन में उसे हेय दृष्टि से देखा जाता था --- नट ने मन में सोचा कि अब अगर राजा कला के भेद भी पूछेगा तो बता दूंगा क्योंकि गुरु का धर्म होता है कि शिष्य के समक्ष कोई भेद गुप्त नहीं होना चाहिए यदि गुरु को लगे कि वह इन भेदों का कोई दुरूपयोग नहीं करेगा ---!

राजा ने विधिवत उस नट को अपना गुरु स्वीकार कर लिया और उन भेदों के लिए गुरु दीक्षा ली साथ ही गुरु दक्षिणा में अपना आधा राज्य दे दिया !

नट के मार्गदर्शन में राजा अब कौतुहल पूर्ण सिद्धियों के मार्ग पर चलने लगा --- बहुत सी सिद्धियाँ अर्जित करने लगा अब उसे रास रंग में वो मजा नहीं आता था जो कि इन लघु साधनाओं में आता था ---!

इसी समय काल में एक संत का आगमन हुआ राजा के पास संत वहाँ पर एक सप्ताह ठहरे और राजा के सरे क्रियाकलापों को देखते रहे अंतिम दिन जब वे जाने वाले थे तो राजा से कहा " हे राजन मुझे अपना ये समय जो मैं आपके साथ गुजारा हमेशा याद रहेगा बहुत कम ऐसे लोग मिलते हैं जो इतना धन बैभव होते हुए भी विरक्तों वाला जीवन गुजारें --- लेकिन मैंने ये भी देखा कि ये आपका लक्ष्य नहीं है ये लघु साधनाएं और कौतुहल पूर्ण कार्य आपको भाव के पार नहीं उतार पाएंगे ---- इसके लिए आपको कुछ इतर करना होगा जिससे आपको आपके जीवन का असली लक्ष्य पता चले --!

राजा नतमस्तक हो गया संत के सामने और प्रार्थना कि " हे संत मैं एक कामी और लोभी रजोगुण से युक्त मनुष्य हूँ -- मुझे नहीं पता कि सही रास्ता क्या है और जीवन का लक्ष्य क्या है -- कैसे भव से पार उतरा जा सकता है -- यदि आपके पास समय हो तो कृपा पूर्वक मेरा मार्ग दर्शन करें "

संत ने राजन का अनुग्रह स्वीकार कर लिया क्योंकि उन्हें भी यही लगा कि यदि उनके माध्यम से किसी का कुछ भला हो सकता है तो इसमें बुरा क्या है ?

छः मॉस तक संत ने राजा के साथ गुजारे और इस समय काल में राजा को बहुत सी योग क्रियाओं और ध्यान कि प्रणाली में पारंगत कर दिया -- और जब उन्हें लगा कि इन सारी  क्रियाओं में राजा पारंगत हो चूका है तो साधना विधान बताकर संत अपने मार्ग को चले --!

इन छः मॉस में विधि का विधान कुछ ऐसा बना कि नट महाराज रास रंग में खो गए और उन्हें याद ही नहीं रहा कि उन्हें उनके परम शिष्य राजा जयद्रथ से मिलना चाहिए ---!

इधर संत ने अपना रास्ता लिया और उधर नट का आगमन हुआ राजा के राज्य में --- मिलते ही आश्चर्य के सागर में गोते लगने लगे नट महाराज को ---- क्योंकि राजा के व्यवहार में और नम्रता में और अधिक परिवर्तन हो चूका था -- इसके अतिरिक्त राजा का मुख एक अलौकिक कांति  से देदीप्यमान हो रहा था  --- नट ने जब इसका रहस्य पूछा तो राजा ने सरल स्वाभाव से सब कुछ वर्णन कर दिया ---!

लघु साधनाओं के उपासक नट को राजा से ईर्ष्या होने लगी कि जो कुछ वह अब तक कि उम्र में अर्जित नहीं कर सका वह राजा ने सिर्फ छह महीने में कर लिया --!

यहाँ गुरु और शिष्य कि भावना का अंत हो गया और नट ने राजा से पूछा  :- " हे महीपति यदि मैं आपको कुछ सलाह देना चाहुँ तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे ?  

राजा ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया " आप मेरे प्रथम गुरु हैं और आपकी कृपा के फलसवरूप ही मैं यहाँ तक पहुँच सका हूँ आप जो कहेंगे वह मुझे शिरोधार्य होगा "

नट ने अपनी बात कुछ इस प्रकार रखी :-

" हे राजन यह सम्पूर्ण जगत एक रंगमंच है जहाँ हम सब लोग किसी शक्ति के हाथों चालित किये जाते हैं और हममे से हर एक माया में फसा हुआ है जहाँ हम अपना और पराया जपते रहते हैं --- जीवन का वास्तविक लक्ष्य होता है परम गति को प्राप्त करना लेकिन यह परम गति भी तभी सम्भव है जब कोई परम शक्ति हमारे सर पर अपना हाथ रखे और इसके लिए हमें साधनाएं करनी होती हैं --- अब साधना कि सफलता भी हमारे बहुत से पुण्य कर्मों पर आधारित होती है -- कई बार सम्पूर्ण जीवन कि आहुति के बाद भी हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते --! किन्तु कई साधनाएं ऐसी भी हैं जिनके माध्यम से हम देवगणों कि कृपा अतिशीघ्र प्राप्त कर लेते हैं और इसके बाद मुक्ति सरलता से सम्भव हो जाती है "

----- राजा को नट कि बात में कोई संदेह नहीं था क्योंकि संत गुरु में भी कमोवेश यही शिक्षा दी थी इसलिए राजा ने पुनः दंडवत किया नट गुरु को क्योंकि राजा ज्ञानी गुरु मिले हुए थे अतएव अब मुक्ति में कोई संदेह ही नहीं नजर आता था 

नट ने अपनी बात जरी रखी :- " इसलिए मेरे अपने ज्ञान के हिसाब से तुम्हे किसी एक देव या देवी कि साधना करने के बजाय कई इष्टों कि साधना करनी चाहिए जिससे उनमे से किसी एक कि कृपा आप निश्चित ही कर पाओगे "

"मुक्ति प्रदान करने वाले देवों  में  विष्णु और रूद्र कि साधना करो इसके साथ ही आदि शक्ति माता महामाया के विभिन्न रूपों कि साधना करों , ये कुछ साधना विधियां हैं इनके आधार पर आगे बढ़ो "

ऐसा कहकर नट अपने रस्ते चला गया और राजा नट के द्वारा प्रदत्त ज्ञान के आधार पर साधना रत हुआ  !

दैवयोग से कुछ समय के पश्चात् राजा जिन भी इष्टों कि साधना करता था उन सबके दर्शन हुए उसे और सब ने उसे कहा " हे राजन तुम्हारी तपस्या और श्रद्धाभाव से हम प्रसन्न हैं और तुमसे कौल  करते हैं कि आवश्यकता पड़ने पर यदि तुम हमें पूर्ण श्रद्धा भाव से याद करोगे हम वहीँ पर उपश्थित होंगे और तुम्हे समस्याओं से मुक्त करेंगे "

अब राजन भयमुक्त था उसे अब अपने जीवन चक्र को पूरा करते हुए अंतिम समय का इन्तजार था --- इसी समय काल में नट भी निरंतर राजा के संपर्क में बना रहा और खूब सत्संग और धार्मिक चर्चाएं होती रही --- नट हमेशा राजा को नए धार्मिक प्रसंग सुनाता था और राजा बड़े मनोयोग से उन्हें सुनता था --- लेकिन जितनी भी अधिक धार्मिक चर्चाएं होतीं और विभिन्न देवी और देवताओं कि लीलाएं वह सुनता उसका विश्वाश डगमगा जाता जाता --- कई बार उसे लगता कि अब तक उसने जो भी साधनाएं कि हैं वे इतनी प्रभावी नहीं हैं --- अमुक चर्चा में में देवी या देवता थे उनकी शक्तिया और भक्त वत्सलता ज्यादा प्रभावी है --- समय बीतता गया और राजा के मन में संदेह के बीज बढ़ते चले गए --- इसी दौरान पडोसी राजा को पता चला कि राजा जयद्रथ सन्यासी जीवन बिता रहा है और वह अब संहार के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता सो उसने जयद्रथ के राज्य पर चढ़ाई कर दी --!

राजा जयद्रथ था तो क्षत्रिय ही उसका राजधर्म और रक्तगुण कैसे इस बात को सह लेता कि कोई उसके राज्य पर अनाधिकार कि चेष्टा करे उसने युद्ध किया किन्तु बंदी बना लिया गया --!

बंदीगृह में जब उससे नट मिलने आया तो नट ने हालचाल पूछा --- राजा ने जवाब दिया कि बस अब अंतिम क्षणों कि तयारी है देखते हैं कि जीवन कितने क्षण और है इसके बाद परमानन्द कि तयारी --- लेकिन नट ने राजा को कहा कि "एक बार आजमा कर देखो सरे इष्टों ने मिलकर तुम्हे ये कहा था कि मुसीबत में जब भी पुकारोगे तब हम सहायता के लिए आयेंगे "

राजा के मन में जीवन का मोह जाग उठा -- स्थितिप्रज्ञता कि भावना नाश हो गया --- लेकिन राजा शंकित था कि कौन सा इष्ट मुझे पुनर्जीवन दे सकेगा -- यदि वह इष्ट जिसे मैंने याद किया वह पुनर्जीवन देने में सफल न हो सका तो मेरा उसे बुलाना असफल हो जायेगा -!

यही सब सोचते सोचते पूरी रात गुजर गयी लेकिन वह फैसला नहीं कर सका --- सुबह होते - होते उसने निश्चय किया कि वह सबका एक साथ आवाहन करेगा !

तभी उसे पता चला कि आज ही उसके लिए फांसी कि सजा निर्धारित की गयी है --- राजा ने सभी देवों और देविओं का आवाहन किया -- जैसे ही उन्हें ये पता चला कि उनका भक्त संकट में है सब वहाँ से निकले सबका लक्ष्य भक्त कि सहायता -!

भगवान विष्णु , रूद्र , कुबेर , माता भद्रकाली , माता वैष्णो , माता पीताम्बरा रास्ते में सब एक दूसरे से मिले तो चर्चा प्रारम्भ हो गयी अंततः पता चला कि सब एक ही भक्त के लिए जा रहे हैं -- आगे चलकर फिर से रस्ते अलग - अलग हो जाते थे सबके उनकी प्रकृति और वाहनो के अनुसार जैसे ही रस्ते अलग हुए तो सभी देवों और देविओं को लगा कि बाकि सब तो पहुँच ही रहे हैं यदि वे न भी पहुंचें तो कोई हानि नहीं है क्योंकि उनमे से प्रत्येक पूर्ण है --- और इसी सोच के चलते राजा के पास तक कोई नहीं पहुंचगा और राजा  को फांसी हो गयी इसके साथ ही रजा का जीवन चक्र पूरा हुआ लेकिन अपने पुण्य प्रभाव से राजा धर्मराज के दरबार में जा पहुंचा और अब उसका फैसला होना था कि उसे क्या मिलेगा ?  


  क्रमशः 


Friday, January 24, 2014

YAKSHAS AND YAKSHINIES - यक्ष एवं यक्षिणी

YAKSHAS AND YAKSHINIES
The Jains worship idols of the Jinas, Tirthankars1, who are reverend as supreme beings but as the time passed by the Jains also started worshipping many other deities, Yaksas and Yaksinis, in Jain temples. Many wonder who are they? How did they get there? How did they get such an importance? Should they be there?
The answer to the first question is, even though at times it may seem that they get more reverence by many people, they are not same as Jina, Arihant, or Tirthankars who have conquered the inner passions. These deities (Yaksas and Yaksinis) are full of passions and are wandering through the cycles of births and death just like us. They are also called shashandevtas, the gaurdian deities. They are heavenly beings of Vyantar group who have supernatural powers including ability to change their forms and sizes. The answer to the second question is, according to some beliefs, Jains believe that these Yaksas and Yaksinis were appointed by Indra to look after the well being of Tirthankaras. Therefore, they were always found around Jinas and that has reflected their presence in the Jain temples and also around the idols of the Jinas. They are found in a pair of a male (yaksha) and a female (yakshini). Yaksa usually found on the right side of the Jina idol while yaksini on the left side. In the earlier period they were regarded mainly as the devotees of Jina but as the time passed by, people started to worship them too.
Not all Yaksa are benevolent, because some can be malevolent. Just as some Yaksa paid homage to Lord mahavira and protectd him from some sufferings, Yaksa Sulpani troubled Lord Mahavira in his mediation and inflicted much suffering and similar stories are available where yaksa troubled others too. The residential place (bhavana) of Yaksa is also known as a chaitya or ayatana. It could be anywhere, outside the city, on the hill or a mountain, on the tree, by the water reservoir, at the gate of a city, or within a city in a house or a palace. The famous Yaksa Angulimala was living on the tree in the forest and when reformed for the better, he had a place at the city gate.
The humans are opportunistic and since Jinas would not reward no matter how sincerely one may worshiop them, Jains looked at yaksas and yaksanis for the immediate returns, and to self serve Jains gave them the places in their temples. Some Yaksa were and are known for bestowing fertility and wealth upon their devotes. Therefore, they had become very popular and their idols have been placed in the Jain temples and Jains worship them. Jains offer them the different things in favor of boons for children, wealth or freedom from fear, illness or disease.
The earlier scriptures like the Sthanangasutra, Utradhyayansutra, Bhagwatisutra, Tattvarthsutra, Antagadasasaosutra, and Paumacariya have frequent references to the Yaksa. Their reference as Shasandevatas in the Harivamsapurana (783 A.D.) made the beginning of this concept. Among all the yakshas, Manibhadra and Purnabadra yakshas and Bahuputrika yakshini have been the most favored one. Manibhadra and Purnabhadra yakshas are mentioned as the chief of demigods, Manibhadra of Northern horde and Purnabhadra of Southern horde. Bahuputrika (having many sons) is named as one of the queen of Manibhadra. Harivamsapurana also describes the capability of yakshas and yakshnins to pacify the harmful power of rogas, grahas, raksasas, bhutas and pisachas. The people also believed that they bestowed favors to those who worshiped them and because of that they became more popular than Jinas for some. The people started worshipping them for the materialstic desires, which could not be fulfilled, by the worship of Vitaraga Jina. Due to this, between tenth and thirteenth centuries A. D.2 yaksha Saarvanubhuti, or Sarvahna and yakshini Cakreshvari, Ambika, Padmavati, and Jvalamalini became so popular that independent followers developed around them. Various temples were erected just to worship them and you can see that even now.
The Jain works from the sixth to the tenth century A. D. mention only some of the iconographic features of Yaksharaja (Sarvahna or Sarvanubhuti) and Dharanendra Yaksha and Cakreshvari, Ambika, Padmavati Yakshini. The list of twenty-four Yaksha-Yakshini pairs was finalized in about eight-ninth century A. D. as found in Kahavali, Tiloyapannatti (4.934-39), and Pravacanasaroddhara (375-78). While their independent iconographic forms were standarized in c.11th - 12th century A. D. as mentioned in the Nirvankalika, the Trisastisalakapurusacaritra, the Pratisthasara-samgraha, Pratisthasaroddhara, the Pratisthatilaka and acaradinakara and a number of other texts. However, we find much difference between Svetambara and Digambara traditions as to the names and iconographic features of Yakshas and Yakshinis2. The names and the iconographic features of the majority of them bear the influence of the Brahminical and Buddhist gods and goddesses. The Jains seem to have adopted either the names or the distinct iconographic features, or both, in such cases2.
The original Agamas don’t mention about the Jina idol and idol worship, even then for last 2500 years Jains have constructed the thousands of excellent temples at the tremendous cost and have installed the idols to respect the Tithankars. Therefore the idea of idol and idol worship, even that of the Jinas, was anathema to the very spirit and words of the Jinas. But now by erecting and worshipping Yakshas and Yakshinis, and asking for the materialistic gains from them, Jains are distracted from the spiritual path and attracted to the materialistic attachments. For a moment even if we look at the materialistic gain by their worship then everybody who worships them should get benefited, but that does not happen. Therefore, one lives in mithyatva (falsebelief). One should not forget that if at all the materialistic gain is attained then that is by the maturation of one’s own shubha (good karmas). Somadeva might have felt that these sasana-devatas may replace rather than being complementary to the Jinas as the object of the worship cautioned; anyone who worship them equal to Jina is headed in the wrong direction. Asadhara declares that a person with true insight would never worship Yaksas even when beset with the great calamities. Because as a Jain, we believe that our calamities are our own doing and we should bare down such calamities with calmness to stop the whirlpool of reaction which would do nothing but will bring more calamities. In conclusion, the guidelines which are set in Jainism tell us what is right and wrong, but it is up to each individual to decide which idols to bow down (worship) to and which ones we should just admire.
1 Sthanakvasi and Terapanthi Jains of Svetambers sect and Taranpanthi Jains of Digambar sect don’t believe in idol worhiping.
Ambika in Jaina arts and literature by Dr. M.N.P. Tiwari, published by Bhartiya Jnanapith.
Some of the prominent yakshas and yakshanis*:
CHAKRESHWARE DEVI
She is the dedicated attendant deity of lord Adinath (Rishabhadev). She is also called by another name i.e. Apratichakra. The color of this goddess is golden. Her Vehicle is the eagle. She has eight arms. In her four right hands she holds the blessing mudra, arrow, rope and wheel. In her four left hands she holds the rein, the bow, the protective weapon of Indra and the wheel.
AMBIKA DEVI
She is the dedicated deity of Lord Neminath the 22nd Tirthankara. She is also called Ambai Amba and Amra Kushmandini. Her color is golden and the lion is her vehicle. She has four arms. In her two right hands she carries a mango and in the other a branch of a mango tree. In her one left hand she carries a rein and in the other she has her two sons.


PADMAVATI DEVI
She is the dedicated deity of Lord Parshvanath, the 23rd Tirthankara. Her color is golden and her vehicle is the snake with a cock's head. She has four arms and her two right hands hold a lotus and a rosary. The two left hands hold a fruit and a rein.






SARASWATI DEVI
Saraswati, the goddess of knowledge, is considered to be the source of all the learning. This divine energy is the source of spiritual light, remover of all ignorance and promoter of all knowledge. She is respected and adored by all the faiths, worldly persons and saints. She has four arms, one holding a book, the other a rosary and two hands holding a musical instrument Veena. Her seat is a lotus and the peacock is her vehicle representing equanimity in prosperity. In some places it is mentioned that the swan is her vehicle.
LAKSHMI DEVI
Goddess Lakshmi represents the wealth. The people worship her as the goddess of wealth, power, money etc. In the upper two hands, she is holding a lotus with an elephant, in the lower right  hand a rosary and in the lower left hand a pot.
MANIBHADRA DEV
Shri Manibhadra is originally a yaksha, worshipped by Indian masses since very old times and his introduction to Jain worship is only a later adaptation. It is an image of six armed yaksha with an elephant as his vehicle.
GHANTAKARNA VEER
This deity is worshipped for the protection and for driving away the evil influence created by the lower types of negative energy. His arrow indicates penetration of evil forces. The bow gives forceful momentum to the arrow. His symbol is the bell that resounds to create auspicious sounds in the atmosphere. Sometimes the people who are not aware of the facts call him by mistake Ghantakarna Mahavira that creates confusion between Lord Mahavira and Ghantakarna Veer. He is not connected to Lord Mahävir in any way.
NAKODA BHAIRAVA
This is the tutelary deity of Bhairava. This deity is usually found near the entrance of the temple. People from far and near, visit the shrine and make offerings to the deity on fulfillment of their material desires. It is the positive force around the temple.
BHOMIYAJI
This deity is in the shape of a mountain. It is the natural positive energy of the mountain Sametshikharji. This energy inspires and guides the believers and the travelers.


Information Taken from :- http://www.jainworld.com/education/seniors/senles21.htm

Monday, January 20, 2014

बर्ह्मचर्य - Brahmcharya


बर्ह्मचर्य







बहुत सुनते आये हैं कि ब्रह्मचर्य एक ऐसी विधा है जिसका पालन करने से शरीर हष्ट पुष्ट रहता है ... बहुत सी बीमारियां तो ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों के पास भी नहीं फटकती हैं ... और साधना कि दुनिया में तो इसका खाश महत्व है ... ऐसी कोई भी साधना का मार्गदर्शन मैंने आज तक नहीं देखा जहाँ यह न कहा जाता हो कि ब्रह्मचर्य   एवं इन्द्रिय संयम अति आवश्यक है इसके आभाव में सफलता कि कामना न करें ...!

तो आखिर ये ब्रह्मचर्य होता क्या है ..?

वस्तुतः ब्रह्मचर्य का सीधा सा अर्थ हमारे समाज में सम्भोग के साथ लगाया जाता है .... और सोचा जाता है कि यदि साधना काल में हमने खुद को सम्भोग से बचा लिया तो ब्रह्मचर्य पूरा हो गया और अब साधना कि सफलता से अब कोई नहीं रोक सकता ...!

लेकिन मैं कहता हूँ कि आप गलत हैं .... ब्रह्मचर्य का मतलब यह कटाई नहीं है ...!

हमारे साहित्य में तीन भावनाएं उल्लेखित हैं ..
१. मनसा
२. वाचा
३. कर्मणा

और इन तीनो पर नियंत्रण के बाद ही पूर्ण ब्रह्मचर्य सम्भव है .!

अ . जैसे कि यदि आप अपने आपको सम्भोग क्रिया से तो बचा लेते हैं लकिन मानसिक रूप से आप किसी युवती के बारे में सोचते हैं तो आपका ब्रह्मचर्य खंडित हो जाता है .
ब . आप ने खुद को सम्भोग से बचा लिया इसके बाद आपने किसी युवती के बारे में सोचने से भी बचा लिया किन्तु आपने किसी को अपशब्द प्रयोग किये या कुछ गलत बोल दिया तो भी आपका ब्रह्मचर्य भंग हो गया .
स . यदि आपने अपने आपको मनसा और वाचा से सुरक्षित कर लिया लकिन आप शारीरिक रूप से कहीं आसक्त हो गए तो यहाँ भी आपका ब्रह्मचर्य भंग हो जाता है ...!

ये तो हुआ ब्रह्मचर्य को पालित करने कि बात किन्तु इसकी भी कुछ दशाएं हैं ..!

कई बार परुषों में या स्त्रियों में अप्रत्याशित रूप से स्वप्नदोष हो जाते हैं .... ये भी ब्रह्मचर्य खंडित होने कि श्रेणी में हैं किन्तु यदि सोने से पूर्व किसी विपरीत लिंगी का  ध्यान या चिंतन नहीं किया गया है तो यह ब्रह्मचर्य के खंडन कि श्रेणी में नहीं आता किन्तु यदि यह साधना काल में हुआ है तो इसके लिए प्रायश्चित आवश्यक है ...!

ये तो हुयी ब्रह्मचर्य कि बात किन्तु फिर एक सवाल यह पैदा होता ही कि यदि कोई साधक गृहस्थ आश्रम से है और शादीशुदा है तो क्या करे ?

इस दशा में मानदंडों में कुछ परिवर्तन देखने को मिलते हैं ... यदि साधना काल सवा महीने यानि कि ४० दिन या इससे कम का है तो स्त्री संसर्ग वर्जित है गृहस्थ धर्म में भी किन्तु यदि साधना काल इससे ज्यादा समय का है तो एक सप्ताह में या फिर यदि इससे भी ज्यादा समय जितना आप साध सकें तो उस समय में अधिकतम एक बार आप स्त्री संसर्ग कर सकते हैं और यह ब्रह्मचर्य खंडन कि श्रेणी में नहीं आता है ...!

किन्तु जिन लोगों ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश नहीं किया अर्थात शादी शुदा नहीं हैं .... उनके लिए कोई छूट नहीं है ... !

इसके अतिरिक्त अगर साधना के दृष्टिकोण से बात करें तो नियम मुख्यतया साधना कि विधि जो होती है उसी के हिसाब से निर्धारित होते हैं .... इसलिए यदि आप किसी साधना में रत होना चाहते हैं तो सर्वप्रथम अपने गुरु से जो उस साधना के लिए आपके अग्रज हैं या जिन्होंने आपको साधना प्रदान कि है उनसे परामर्श अवश्य ले लें ... और सारे यम और नियम का पालन उनके आदेशानुसार करें .

यहाँ पर मैंने जिन सिद्धांतों कि चर्चा कि वे सभी सामान्य सिद्धांत कि श्रेणी में आते हैं .... विशेष परिस्थितियों में या देश काल के हिसाब से परिवर्तन स्वीकार्य होता है ... !

क्योंकि वेदों ने भी और पुरानो ने भी एक बात सर्वसहमति से स्वीकार किया है कि किसी भी प्रकार के मतभेद में .... सबसे पहले वहाँ के समाज में प्रचलित रीतिओं का पालन ... इसके बाद भी अगर मतभेद बाकि है तो हमे वहाँ के धर्म गुरुओं से परामर्श करना चाहिए ... इसके बाद भी यदि मतभेद है तो अंत में वैदिक / प्राचीन ग्रन्थ में वर्णित विधि अपनी जनि चाहिए भले ही वह कितनी भी क्लिष्ट हो .

जय माता महाकाली