Monday, January 13, 2014

कुण्डलिनी / प्राण शक्ति Kundalini Shakti - 6 - 7 -8 - 9 - 10


कुण्डलिनी / प्राण शक्ति - 6


अब यहाँ पर एक बात और अधिकतर प्रचलन में है कि ... साधक यदि सीधे आज्ञा चक्र में अपने ध्यान को केंद्रित करता है तो समयांतराल में वह सरे चक्रों पर नियंत्रण कर लेता है यानि कि सारे चक्र जाग्रत अवस्था में आ जाते हैं ...

यह सत्य हो सकता है या सत्य है भी ... किन्तु मैं इसका समर्थन नहीं करता ... क्योंकि यह कई बार घटक होता है और साधक का सर्वनाश तक कर देता है ...!

हम इसे विद्युत् यांत्रिकी के सिद्धांत के माध्यम से समझ सकते हैं ..... जैसे कि हमारे घर में सामान्यतया ११० / २२० वोल्ट कि विद्युत् प्रवाहित होती है ... कई बार फैंसी झालर बनाने के लिए हम लूप का इस्तेमाल करते हैं जिसमे हम कई छोटे बल्बों को एक विशेष तारतम्य में जोड़ देते हैं और इसके साथ ही एक विभिन्न रंग कि एक सुन्दर झालर तैयार हो जाती है ... लकिन उसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है जबकि उसके सारे बल्ब अपना काम करते रहें ... यदि बीच में से का एक बल्ब ख़राब हो जाता है तो सारी झालर ख़राब हो जाती है ... और यदि हम उसमे से ख़राब बल्ब को बाईपास कर दें तो झालर जल तो जाती है लकिन उसका जीवन काल कम हो जाता है ... ठीक इसी प्रकार यदि हम सारे बल्ब हटाकर सिर्फ एक बल्ब को उस तारतम्य में लगा देते हैं तो भयानक या हलके बिस्फोट के साथ वह बल्ब फूट जाता है ... क्योंकि सारे बल्ब मिलकर जिस विद्युत् धारा का संवहन कर सकते थे अब वे साथ नहीं हैं ... !

इसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति के भी समस्त चक्र काम करते हैं और यदि उन्हें उनके क्रम से जाग्रत किया जाता है तो वह विद्युत् प्रवाह समग्र जीवन के लिए अनवरत होता है .... जबकि यदि उसी शक्ति को कहीं मध्य भाग से जाग्रत करने कि कोशिश कि जाती है तो वही प्राण शक्ति मृत्यु शक्ति में परिवर्तित हो शक्ति है ...!

इसलिए सभी मित्रों से आग्रह है कि ... संक्षिप्त रीति हर जगह प्रभावी नहीं होती ...... सम्पूर्ण विधान सफलता का सूचक होता है इसलिए संक्षिप्त रीति को तिलांजलि दें और पूर्ण विधि विधान को अपनाएं ......

मैं क्रमशः आप सबके लिए इस विधा के सारे रहस्य उजागर करूँगा .. बस आपके धैर्य और सहयोग कि अपेक्षा रखता हूँ ... मुझे पूर्ण विश्वाश है कि इसमें मैं सफल होउंगा ..... इस सम्बन्ध में यदि आप चाहें तो मुझसे प्रश्न भी कर सकते हैं ... मेरी मेल आइ डी है :- rk.singh.fb@gmail.com





कुण्डलिनी / प्राण शक्ति - 7




मूलाधार-चक्र
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मूलाधार-चक्र वह चक्र है जहाँ पर शरीर का संचालन वाली कुण्डलिनी-शक्ति से युक्त ‘मूल’ आधारित अथवा स्थित है। यह चक्र शरीर के अन्तर्गत गुदा और लिंग मूल के मध्य में स्थित है जो अन्य स्थानों से कुछ उभरा सा महसूस होता है। शरीर के अन्तर्गत ‘मूल’, शिव-लिंग आकृति का एक मांस पिण्ड होता है, जिसमें शरीर की संचालिका शक्ति रूप कुण्डलिनी-शक्ति साढ़े तीन फेरे में लिपटी हुई शयन-मुद्रा में रहती है। चूँकि यह कुण्डलिनी जो शरीर की संचालिका शक्ति है और वही इस मूल रूपी मांस पिण्ड में साढ़े तीन फेरे में लिपटी रहती है इसी कारण इस मांस-पिण्ड को मूल और जहाँ यह आधारित है, वह मूलाधार-चक्र कहलाता है।
मूलाधार-चक्र अग्नि वर्ण का त्रिभुजाकार एक आकृति होती है जिसके मध्य कुण्डलिनी सहित मूल स्थित रहता है। इस त्रिभुज के तीनों उत्तंग कोनों पर इंगला, पिंगला और सुषुम्ना आकर मिलती है। इसके अन्दर चार अक्षरों से युक्त अग्नि वर्ण की चार पंखुणियाँ नियत हैं। ये पंखुणियाँ अक्षरों से युक्त हैं वे – स, ष, श, व । यहाँ के अभीष्ट देवता के रूप में गणेश जी नियत किए गए हैं। जो सा
धक साधना के माध्यम से कुण्डलिनी जागृत कर लेता है अथवा जिस साधक की स्वास-प्रस्वास रूप साधना से जागृत हो जाती है और जागृत अवस्था में उर्ध्वगति में जब तक मूलाधार में रहती है, तब तक वह साधक गणेश जी की शक्ति से युक्त व्यक्ति हो जाता है।
जब साधक-सिद्ध व्यक्ति सिद्धियों के चक्कर अथवा प्रदर्शन में फँस जाता है तो उसकी कुण्डलिनी उर्ध्वमुखी से अधोमुखी होकर पुनः शयन-मुद्रा में चली जाती है जिसका परिणाम यह होता है की वह सिद्ध-साधक सिद्धि का प्रदर्शन अथवा दुरुपयोग करते-करते पुनः सिद्धिहीन हो जाता है। परिणाम यह होता है कि वह उर्ध्वमुखी यानि सिद्ध योगी तो बन नहीं पाता, सामान्य सिद्धि से भी वंचित हो जाता है। परन्तु जो साधक सिद्धि की तरफ ध्यान न देकर निरन्तर मात्र अपनी साधना करता रहता है उसकी कुण्डलिनी उर्ध्वमुखी के कारण ऊपर उठकर स्वास-प्रस्वास रूपी डोरी (रस्सी) के द्वारा मूलाधार से स्वाधिष्ठान-चक्र में पहुँच जाती है।

स्वाधिष्ठान-चक्र
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यह वह चक्र है जो लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है। स्वाधिष्ठान-चक्र में चक्र के छः दल हैं, जो पंखुणियाँ कहलाती हैं। यह चक्र सूर्य वर्ण का होता है जिसकी छः पंखुनियों पर स्वर्णिम वर्ण के छः अक्षर होते हैं जैसे- य, र, य, म, भ, ब । इस चक्र के अभीष्ट देवता इन्द्र नियत हैं। जो साधक निरन्तर स्वांस-प्रस्वांस रूपी साधना में लगा रहता है, उसकी कुण्डलिनी ऊर्ध्वमुखी होने के कारण स्वाधिष्ठान में पहुँचकर विश्राम लेती है। तब इस स्थिति में वह साधक इन्द्र की सिद्धि प्राप्त कर लेता है अर्थात सिद्ध हो जाने पर सिद्ध इन्द्र के समान शरीर में इन्द्रियों के अभिमानी देवताओं पर प्रशासन करने लगता है, इतना ही नहीं सिद्ध-पुरुष में प्रबल अहंकार रूप में अभिमानी होने लगता है जो उसके लिए बहुत ही खतरनाक होता है। यदि थोड़ी सी भी असावधानी हुई तो चमत्कार और अहंकार दोनों में फँसकर बर्बाद होते देर नहीं लगती क्योंकि अहंकार वष यदि साधना बन्द हो गयी तो आगे का मार्ग तो रुक ही जाएगा, वर्तमान सिद्धि भी समाप्त होते देर नहीं लगती है। इसलिए सिद्धों को चाहिए कि सिद्धियाँ चाहे जितनी भी उच्च क्यों न हों, उसके चक्कर में नहीं फँसना चाहिए लक्ष्य प्राप्ति तक निरन्तर अपनी साधना पद्धति में उत्कट श्रद्धा और त्याग भाव से लगे रहना चाहिए।

मणिपूर-चक्र
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नाभि मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अन्तर्गत मणिपूरक नामक तीसरा चक्र है, जो दस दल कमल पंखुनियों से युक्त है जिस पर स्वर्णिम वर्ण के दस अक्षर बराबर कायम रहते हैं। वे अक्षर – फ, प, न, ध, द, थ, त, ण, ढ एवं ड हैं। इस चक्र के अभीष्ट देवता ब्रह्मा जी हैं। जो साधक निरन्तर स्वांस-प्रस्वांस रूप साधना में लगा रहता है उसी की कुण्डलिनी-शक्ति मणिपूरक-चक्र तक पहुँच पाती है आलसियों एवं प्रमादियों की नहीं। मणिपूरक-चक्र एक ऐसा विचित्र-चक्र होता है; जो तेज से युक्त एक ऐसी मणि है, जो शरीर के सभी अंगों-उपांगों के लिए यह एक आपूर्ति-अधिकारी के रूप में कार्य करता रहता है। यही कारण है कि यह मणिपूरक-चक्र कहलाता है। नाभि कमल पर ही ब्रह्मा का वास है। सहयोगार्थ-समान वायु - मणिपूरक-चक्र पर सभी अंगों और उपांगों की यथोचित पूर्ति का भार होता है। इसके कार्य भार को देखते हुये सहयोगार्थ समान वायु नियत की गयी, ताकि बिना किसी परेशानी और असुविधा के ही अतिसुगमता पूर्वक सर्वत्र पहुँच जाय। यही कारण है कि हर प्रकार की भोग्य वस्तु इन्ही के क्षेत्र के अन्तर्गत पहुँच जाने की व्यवस्था नियत हुई है ताकि काफी सुविधा-पूर्वक आसानी से लक्ष्य पूर्ति होती रहे।
मणिपूरक-चक्र के अभीष्ट देवता ब्रह्मा जी पर ही सृष्टि का भी भार होता है अर्थात गर्भाशय स्थित शरीर रचना करना, उसकी सामग्रियों की पूर्ति तथा साथ ही उस शरीर की सारी व्यवस्था का भार जन्म तक ही इसी चक्र पर रहता है जिसकी पूर्ति ब्रह्मनाल (ब्रह्म-नाड़ी) के माध्यम से होती रहती है। जब शरीर गर्भाशय से बाहर आ जाता है तब इनकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है।


अनाहत्-चक्र
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हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही अनाहत्-चक्र है। जिन द्वादश(१२) अक्षरों की बात काही जा रही है वे – ठ, ट, ञ, झ, ज, छ, च, ड़, घ, ग, ख और क हैं। इस के अभीष्ट देवता श्री विष्णु जी हैं। अनाहत्-चक्र ही वेदान्त आदि में हृदय-गुफा भी कहलाता है, जिसमें ईश्वर स्थित रहते हैं, ऐसा वर्णन मिलता है। ईश्वर ही ब्रह्म और आत्मा भी है।

क्षीर सागर – सागर का अर्थ अथाह जल-राशि से होता है और क्षीर का अर्थ दूध होता है। इस प्रकार क्षीर-सागर क अर्थ दूध का समुद्र होता है। इसी क्षीर-सागर में श्री विष्णु जी योग-निद्रा में सोये हुये रहते हैं। नाभि-कमल स्थित ब्रह्मा जी जब अपनी शरीर रचना की प्रक्रिया पूरी करते हैं उसी समय क्षीर सागर अथवा हृदय गुफा अथवा अनाहत् चक्र स्थित श्री विष्णु जी अपनी संचालन व्यवस्था के अन्तर्गत रक्षा व्यवस्था के रूप में आवश्यकता अनुसार दूध की व्यवस्था करना प्रारम्भ करने लगते हैं और जैसे ही शरीर गर्भाशय से बाहर आता है वैसे ही माता के स्तन से दूध प्राप्त होन
े लगता है और आवश्यकतानुसार दूध उपलब्ध होता रहता है। यहाँ पर कितना दूध होता है, उसका अब तक कोई आकलन नहीं हो सका है। सन्तान जब तक अन्नाहार नहीं करने लगता है, तब तक दूध उपलब्ध रहता है, इतना ही नहीं जितनी सन्तानें होंगी सबके लिए दूध मिलता रहेगा। ऐसी विधि और व्यवस्था नियत कर दी गयी है। दूसरे शब्दों में ब्रह्मा जी का कार्य जैसे ही समाप्त होता है, श्री विष्णु जी का कार्य प्रारम्भ हो जाता है और श्री विष्णु जी का कार्य जैसे ही समाप्त होता है, शंकर जी का कार्य वैसे ही प्रारम्भ हो जाता है। माता के दोनों स्तनों में तो क्षीर (दूध) रहता है परन्तु दोनों स्तनों के मध्य में ही हृदय-गुफा अथवा अनाहत्-चक्र जिसमें श्री विष्णु जी वास करते हैं, होता है। अर्थात् जो क्षीर-सागर है, वही हृदय गुफा है और जो हृदय गुफा है वही अनाहत्-चक्र है और इसी चक्र के स्वामी श्री विष्णु जी हैं।


विशुद्ध-चक्र
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कण्ठ स्थित चन्द्र वर्ण षोडसाक्षर अः, अं, औ, ओ, ऐ, ए, ऊ, उ, लृ, ऋ, ई, इ, आ, अ वर्णों से युक्त षोडसदल कमल की पंखुड़ियों वाला यह चक्र विशुद्ध-चक्र है, यहाँ के अभीष्ट देवता शंकर जी हैं।
जब कुण्डलिनी-शक्ति विशुद्ध-चक्र में प्रवेश कर विश्राम करने लगती है, तब उस सिद्ध-साधक के अन्दर संसार त्याग का भाव प्रबल होने लगता है और उसके स्थान पर सन्यास भाव अच्छा लगने लगता है। संसार मिथ्या, भ्रम-जाल, स्वप्नवत् आदि के रूप में लगने लगता है। उस सिद्ध व्यक्ति में शंकर जी की शक्ति आ जाती है।

आज्ञा-चक्र
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भू-मध्य स्थित लाल वर्ण दो अक्षरों हं, सः से युक्त दो पंखुड़ियों वाला यह चक्र ही आज्ञा-चक्र है। इसका अभीष्ट प्रधान आत्मा (सः) रूप शब्द-शक्ति अथवा चेतन-शक्ति अथवा ब्रह्म-शक्ति अथवा ईश्वर या नूरे-इलाही या चाँदना अथवा दिव्य-ज्योति अथवा डिवाइन लाइट अथवा भर्गो-ज्योति अथवा सहज-प्रकाश अथवा परमप्रकाश अथवा आत्म ज्योतिर्मय शिव आदि-आदि अनेक नामों वाला परन्तु एक ही रूप वाला ही नियत है। यह वह चक्र है जिसका सीधा सम्बन्ध आत्मा (सः) रूप चेतन-शक्ति अथवा शब्द-शक्ति से और अप्रत्यक्ष रूप अर्थात् शब्द-शक्ति के माध्यम से शब्द-ब्रह्म रूप परमेश्वर से भी होता है। दूसरे शब्दों में आत्मा का उत्पत्ति स्रोत तो परमेश्वर होता है और गन्तव्य-स्थल आज्ञा-चक्र होता है।


ध्यान केन्द्र और दिव्य-दृष्टि अथवा तीसरी आँख
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ध्यान केंद्र
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शंकर जी से लेकर वर्तमान कालिक जितने भी योगी-महात्मा, ऋषि-महर्षि आदि थे और हैं, चाहे वे योग-साधना करते हों या मुद्राएँ, प्रत्येक के अन्तर्गत ध्यान एक अत्यन्त आवश्यक योग की क्रिया है जिसके बिना सृष्टि का कोई साधक-सिद्ध, ऋषि-महर्षि, योगी, अथवा सन्त-महात्मा ही क्यों न हो आत्मा को देख ही नहीं सकते अथवा आत्मा का दर्शन या साक्षात्कार हो ही नहीं सकता है। दूसरे शब्दों में योग-साधना के अन्तर्गत ध्यान का वही स्थान है जो शरीर के अन्तर्गत ‘आँख’ का। जिस प्रकार शरीर या संसार को देखने के लिए सर्वप्रथम आँख का स्थान है उसी प्रकार आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म को देखने और पहचानने के लिए ध्यान का स्थान है। ध्यान का केंद्र आज्ञा-चक्र ही होता है। यही स्थान त्रिकुटि-महल भी है।
योगी-साधकों के आदि प्रणेता श्री शंकर जी कहलाते हैं। योग-साधना की क्रियाओं अथवा मुद्राओं का सर्वप्रथम शोध शंकर जी ने ही किया था। ध्यान आदि मुद्राओं के सर्वप्रथम शोधकर्ता होने के कारण ही सोsहं के स्थान पर कुछ योगी-महात्मा शिवोsहं तथा मूलाधार स्थित मूल शिवलिंग और शम्भू भी हंस स्वरूप ही कहलाने लगे।

दिव्य-दृष्टि अथवा तीसरी आँख
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दिव्य-दृष्टि वह दृष्टि होती है जिसके द्वारा दिव्य-ज्योति का दर्शन किया जाता है| दिव्य-दृष्टि को ही ध्यान केंद्र भी कहा जाता है। शरीर के अन्तर्गत यह एक प्रकार की तीसरी आँख भी कहलाती है। इसी तीसरे नेत्र वाले होने के कारण शंकर जी का एक नाम त्रिनेत्र भी है। यह दृष्टि ही सामान्य मानव को सिद्ध-योगी, सन्त-महात्मा अथवा ऋषि-महर्षि बना देती है बशर्ते कि वह मानव इस तीसरी दृष्टि से देखने का भी बराबर अभ्यास करे। योग-साधना आदि क्रियाओं को सक्षम गुरु के निर्देशन के बिना नहीं करनी चाहिए अन्यथा विशेष गड़बड़ी की सम्भावना बनी रहती है।


सहस्रार-चक्र
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सहस्र पंखुणियों वाला यह चक्र सिर के उर्ध्व भाग में नीचे मुख करके लटका हुआ रहता है, जो सत्यमय, ज्योतिर्मय, चिदानंदमय एवं ब्रह्ममय है, उसी के मध्य दिव्य-ज्योति से सुशोभित वर और अभय मुद्रा में शिव रूप में गुरुदेव बैठे रहते हैं। यहाँ पर गुरुदेव सगुण साकार रूप में रहते हैं। सहस्रार-चक्र में ब्रह्ममय रूप में गुरदेव बैठकर पूरे शरीर का संचालन करते हैं। उन्ही के इशारे पर भगवद् भक्ति भाव की उत्प्रेरणा होती है। उनके निवास स्थान तथा सहयोग में मिला हुआ दिमाग या मस्तिष्क भी उन्ही के क्षेत्र में रहता है जिससे पूरा क्षेत्र एक ब्रह्माण्ड कहलाता है, जो शरीर में सबसे ऊँचे सिर उसमें भी उर्ध्व भाग ही ब्रह्माण्ड है। योगी-यति, ऋषि-महर्षि अथवा सन्त-महात्मा आदि जो योग-साधना तथा मुद्राओं से सम्बंधित होते हैं, वे जब योग की कुछ साधना तथा कुछ मुद्रा आदि बताकर और कराकर गुरुत्व के पद पर आसीन हो जाते हैं उनके लिए यह चक्र एक अच्छा मौका देता है, जिसके माध्यम से गुरुदेव लोग जितने भी योग-साधना वाले हैं अपने साधकों को पद्मासन, स्वास्तिकासन, सहजासन, वीरासन आदि आसनों में से किसी एक आसान पर जो शिष्य के अनुकूल और आसान पड़ता हो, पर बैठा देते हैं और स्वांस-प्रस्वांस रूप प्राणायाम के अन्तर्गत सोsहं का अजपा जाप कराते हैं। आज्ञा-चक्र में ध्यान द्वारा किसी ज्योति को दर्शाकर तुरन्त यह कहने लगते हैं कि यह ज्योति ही परमब्रह्म परमेश्वर है जिसका नाम सोsहं तथा रूप दिव्य ज्योति है। शिष्य बेचारा क्या करे ? उसको तो कुछ मालूम ही नहीं है, क्योंकि वह अध्यात्म के विषय में कुछ नहीं जानता। इसीलिए वह उसी सोsहं को परमात्मा नाम तथा ज्योति को परमात्मा का रूप मान बैठता है। खेचरी मुद्रा से जिह्वा को जिह्वा मूल के पास ऊपर कण्ठ-कूप होता है जिसमें जिह्वा को मूल से उर्ध्व में ले जाकर क्रिया कराते हैं, जिसे खेचरी मुद्रा कहते हैं, इसी का दूसरा नाम अमृत-पान की विधि भी बताते हैं। साथ ही दोनों कानों को बंदकर अनहद्-नाद की क्रिया कराकर कहा जाता है कि यही परमात्मा के यहाँ खुराक है, जिससे अमरता मिलती है और यही वह बाजा है जो परमात्मा के यहाँ सदा बजता रहता है। योग की सारी जानकारी तो आज्ञा-चक्र में आत्मा से मूलाधार स्थित जीव पुनः मूलाधार स्थित जीव से आज्ञा-चक्र स्थित आत्मा तक ही होती है।




कुण्डलिनी / प्राण शक्ति - 8


कुण्डलिनी शक्ति जागरण के समय खान पान :-


जब भी साधक कुण्डलिनी जागरण के लिए अपने प्रयास प्रारम्भ कर देता है उस समय उसे अपने खान पान पर भी ध्यान देना अति आवश्यक हो जाता है ..... क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध शक्ति संतुलन या विद्युत् प्रवाह कि अनवरत गति से होता है .....!


इस दशा में साधारण भोजन जिसमे तेल और मशाले कि मात्रा बिलकुल न हो ... ऐसा भोजन ग्रहण करने योग्य होता है ... ज्यादा मसालेदार भोजन शरीर में प्रवाहित शक्ति को उग्र करने का काम करता है जिसकी वजह से कई बार शारीरिक परेशानियां प्राम्भ हो जाती हैं .... !


इसलिए उबली हुयी चीजें जिनमे तेल मशाले कि मात्रा बिलकुल न हो ... और गरिष्ट पदार्थ अपने खान पान से हटा दें .... जैसे छाछ , मिर्च , ज्यादा मीठी चीजें , ज्यादा नमक , पराठे , प्याजा और लहसुन से युक्त चीजें , और तेल में तले हुए पदार्थ ....!


भोजन में साधारण चीजों का इस्तेमाल करें ... जैसे कि उबले हुए चावल , उबली हुयी आलू , पतली और भली भांति पकी हुयी रोटियां / चपाती एवं अन्य हरी सब्जियां जो आपको पर्याप्त ऊर्जा दे सकें जितनी आपके शरीर को आवश्यक हैं ...!


मांसाहार बिलकुल भी वर्जित है ..... जहाँ तक सम्भव हो किन्तु देश काल के आधार पर यह वर्जना लागू नहीं होती ... जैसे कि कोई क्षेत्र विशेष ही ऐसा है कि वहाँ पर सिर्फ मांसाहार ही उपलब्ध है ऐसी दशा में सेवन किया जा सकता है लकिन वह भी तेल या मसालों से युक्त नहीं होना चाहिए सिर्फ भुना हुआ या उबला हुआ होना चाहिए ... अब कुछ लोग ये सवाल उठा सकते हैं कि ... देश या काल के हिसाब से अगर ये वर्जना लागू नहीं होती तो फिर जहाँ शाकाहार उपलब्ध है लकिन कुछ लोग जो पूर्णतया मांसाहारी हैं वे इसका उपयोग क्यों नहीं कर सकते ?


तो मैं यही कहूंगा कि ... यदि सम्भव है तो इसका त्याग कर दें जब तक आपका साधना काल है ... अगर नहीं कर सकते हैं तो जारी रखें . फल या प्रतिफल किस आधार पर मिलेगा ये नियति तय करेगी ....!


वस्तुतः होता यह है कि इन सब चीजों कि वर्जना इसलिए कि जाती है ... क्योंकि जब शक्ति सञ्चालन होता है तो पहले ही वह बहुत उग्र होता है .. और कई बार उसका नियंत्रण असम्भव होता है ..... और शरीर उस उत्तेजना को सह पाने में असमर्थ होता है ..... कई बार साधक कि मृत्यु भी हो जाती है ..... इसीलिए कई बार ये सलाह दी जाती है कि इस तरह कि शक्ति से सम्बंधित साधनाएं सदैव गुरु या किसी योग्य व्यक्ति के संरक्षण में ही करें ... क्योंकि गुरु को ज्ञात होता है कि किस चीज पर किस समय और कितना नियंत्रण करना है .... क्योंकि इस शक्ति कि मूल अधिषठात्री माता महाकाली होती हैं


और जैसा कि सर्व विदित है कि माँ महा काली कि शक्ति अति प्रचंड होती है और इसको नियंत्रित करने कि शक्ति बमुश्किल ही मिल सकती है ..... इसलिए मैं अपने सभी साधकों से या उन लोगों से अनुग्रह करूँगा कि यदि आप इस शक्ति को जाग्रत करने कि सोच रहे हैं तो सबसे पहले अपने आपको किसी भी एक महाविद्या या फिर भगवान शिव का साधक बनाइये इसके बाद कुण्डलिनी / प्राण शक्ति कि तरफ कदम बढाइये ......!


अन्ततोगत्वा फिर भी यदि आप इस क्षेत्र में उतरने के लिए लालायित हैं तो मुझसे जो भी हो सकेगा आपके लिए करूँगा ... और प्रार्थना करूँगा कि माँ महामाया कुण्डलिनी / प्राण शक्ति आप सभी पर अपनी कृपा दृष्टि करें और आपको सफलता प्रदान करें .....!


क्रमशः .........


जय माँ महाकाली


कुण्डलिनी / प्राण शक्ति - 9




स्पष्टीकरण :-






कुण्डलिनी / प्राण शक्ति - ९






इस क्रम पर लिखने के साथ ही बहुत से प्रश्न और टिप्पणियां आ रही हैं मेरे पास .... अधिकतर लोगों का सवाल ये होता है कि ... क्या ये मेरे व्यक्तिगत अनुभव हैं या सिर्फ किताबी ज्ञान ?






इसके सन्दर्भ में कई बार मेरे पास कोई जवाब नहीं होता .. क्योंकि अनुभव और किताबी ज्ञान को कभी भी अलग नहीं किया जा सकता ... बहुत बार हम कहीं पढ़कर किसी विधा के बारे में जानते हैं इसके बाद बहुत से लोगों से उसके बारे में तर्क वितरक करते हैं तब जाकर कहीं ये बात निकल कर सामने आती है कि हम उसे अपने ऊपर प्रयोग कर सकते हैं या नहीं ... इसके बाद शुरू होती है जद्दोजहद इस बात कि कि शुरू कहाँ से करें ..... फिर से खाक छाननी पड़ती है ... तब कहीं जाकर अगर किस्मत साथ हुयी तो किसी सही व्यक्ति का मार्गदर्शन मिल पता है अन्यथा वही अंदर और अवसाद इसके बाद उस विधा से हमारा मन उचाट होने लगता है ...... !






कुण्डलिनी शक्ति के लिए कुछ विशेष तथ्य मैं और स्पष्ट करना चाहूंगा .... जिन्हे मेरे कई मित्र और गुरुजन अन्यथा भी ले सकते हैं किन्तु सच यही है और सफलता का मार्ग भी यही है :-


१. किसी भी साधना के लिए सर्व प्रथम किसी उचित गुरु का चयन करके गुरु दीक्षा जरुर ले लें.


२. कुण्डलिनी शक्ति एक अपरिमित शक्ति संचालन है इसका नियंत्रण साधारण व्यक्ति के वश कि बात नहीं है इसलिए बिना किसी के मार्गदर्शन के इस पर कार्य न करें .


३. कुण्डलिनी शक्ति कि अधिष्ठात्री माँ महाकाली हैं ... इनकी प्रचंड शक्ति को या तो ये स्वयं या फिर भगवन शिव ही नियंत्रित कर सकते हैं .


४. कुण्डलिनी शक्ति पर हाथ आजमाने से पहले सभी साधक पहले दस महाविद्याओं में से किसी एक कि साधना या फिर भगवन शिव कि साधना पर अपना लक्ष्य केंद्रित करें . और कम से कम ६ महीने या एक साल तक तन्मयता पूर्वक साधना के पश्चात् ही कुण्डलिनी शक्ति के बारे में सोचें .


५. कुण्डलिनी शक्ति उर्ध्व गामी शक्ति सञ्चालन होता है इसमें शक्ति का चलन ब्रह्म कि तरफ होता है जो कि सहस्रार चक्र पर स्थित होता है ....


६. बहुत से पुण्य प्रताप और तन्मयता से कि गयी सम्पूर्ण समर्पण सहित साधना के बाद ही इस शक्ति का जागरण सम्भव है ......!


७. एक छोटी सी भूल भी काल के ग्रास में फंसा सकती है ... इसलिए यदि जीवन से प्रेम हो तो कतई इस साधना कि तरफ रुख न करें .






८. क्रमशः चक्र भेदन मूलाधार से होते हुए आज्ञा चक्र तक सफ़र करने के बाद शक्ति सञ्चालन कि क्रिया संपन्न हो जाती है और इसके बाद शुरू होती है समाधी कि अवस्था ...


९. जब आज्ञा चक्र का भेदन पूर्ण हो जाता है तो कई बार साधक कई दिन के लिए कोमा - या निष्क्रियता कि अवस्था में भी चला जाता है ...! किन्तु यह बहुत लम्बा नहीं होता २ दिन से ७ दिन के बीच का होता है .


१०. कई बार साधकों के एक एक करके चक्र जाग्रत होते हैं ... उनके अनुभव भिन्न होते हैं .. और कई बार साधना करते रहने पर अचानक से शक्ति सञ्चालन प्रारम्भ होता है और समस्त चक्रों का भेदन कर देता है .... इस स्थिति के अनुभव भिन्न होते हैं ...!






किन्तु .... प्रक्रिया कोई भी हो ... साधक को महसूस होना प्रारम्भ हो जाता है जैसे ही वह शक्ति चालन के लिए कार्य करना शुरू करता है ...






..... मूलाधार कि स्थिति कई बार गुदा द्वार के पास बतायी जाती है .... किन्तु इस सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं है ... क्योंकि चक्रों कि स्थिति सुषुम्ना नाड़ी के साथ बद्ध होती है ... और इनका स्थान रीढ़ कि हड्डी के साथ ऊपर कि तरफ जाता है है ... तो वैज्ञानिक गड़ना के हिसाब से जहाँ पूछ कशेरुक पाया जाता है .. कई बार मूलाधार चक्र का स्थान वहाँ होता है .... यदि आप अपनी एक ऊँगली या अंगूठे को पूछ कशेरुक वाली हड्डी के पास थोडा बलपूर्वक गड़ाते हैं तो आपको वहाँ पर हल्का सा स्पंदन महसूस होगा ...!






जैसे ही आपका शक्ति जागरण का प्रयास प्रारम्भ करते हैं आपके उन स्थानों में कुछ खुजली या कभी कभी मीठा सा दर्द प्रारम्भ हो जाता है जहाँ पर चक्र अवस्थित होते हैं ... यदि ऐसा नहीं अनुभव होता तो समझ लीजिये कि अभी आप सही रास्ते पर नहीं हैं ... हर व्यक्ति का अपना समय काल भी अलग हो सकता है ... किसी को कुछ महीनो में ही सफलता मिलने लग जाती है ... किसी को सालों लग जाते हैं ... और किसी के लिए पूरा जीवन कम पड़ जाता है ..






कुण्डलिनी / प्राण शक्ति - 10



अब तक मैंने लगभग समस्त बिंदुओं पर अपने विज्ञ पाठकों से चर्चा कि है ... यदि कुछ अनुचित तर्कों और सठ मत्ता को छोड़ दिया जाये तो ..... अपने इस एपिसोड में मैंने देखा कि कैसे कुछ आलसी प्रवृत्ति के लोग ये प्रचारित करते हैं कि ... ये सब सम्भव नहीं है और इसके बारे में बात करने वाले लोग मुर्ख हैं ...!

एक सुधि पाठक ने तो यहाँ तक पूछ लिया कि क्या कुण्डलिनी को हम छू सकते हैं या देख सकते हैं ? यदि नहीं तो फिर ये कोरी कल्पना है ... और हम इस पर विश्वाश नहीं कर सकते ....!

अब मैं इस सम्बन्ध में क्या कहूं ?

सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि अध्यात्म आप उन सब लोगों के लिए नहीं है ... जो उसे छूकर देखना चाहते हैं या आजमाइश कि कसौटी पर कसकर देखना चाहते हैं ...!

मैं दावे के साथ कहता हूँ कि आप इसे छू सकते हैं और जैसे चाहें वैसे आजमा सकते हैं ... लकिन पहले खुद को इस लायक बनाइये तो सही कि आप ऐसा कर सकें ...!

आप आसमान को नहीं छू सकते तो क्या इसका मतलब आसमान नहीं है ?

एक सज्जन ने तो यहाँ तक मुझसे पूछ लिया कि " सुना है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी माता दक्षिणा काली से साक्षात् बात कर सकते थे "
मैंने जवाब दिया कि " हाँ कर सकते थे "
तो उन सज्जन ने पूछा " तो क्या मैं भी कर सकता हूँ " ?
मैंने उनको जवाब दिया कि " हाँ "
तो उनका प्र्शन था " लकिन मैं नहीं कर प् रहा बहुत कोशिश कि मैंने अब तक ... ऐसा क्यों " ?
मैंने उनसे पूछा कि " आप दिन में में कितना टाइम भक्ति के लिए देते हैं ..." ?
तो उन्होंने जवाब दिया " इस भाग दौड़ कि जिंदगी में ज्यादा वक़त है ही किसके पास ? लेकिन फिर भी पर्याप्त समय मैं दे देता हूँ "
मैंने पूछा फिर भी कितना ?
उनका जवाब था कि कभी १० मिनट तो कभी २० मिनट जैसा उपलब्ध हो ?

मैंने उनको जो जवाब दिया उससे वो चिढ गए और मेरी फेसबुक मित्र सूचि से स्वतः ही हट गए
" आप भक्ति के लिए समय अपने हिसाब से निर्धारित करते हैं तो फिर आपने सोच भी कैसे लिया कि माँ काली अपना समय आपके हिसाब से निर्धारित करेंगी ? और दूसरी बात ये कि स्वामी रामकृष्ण बन्ने के लिए आपको अपनी पत्नी को भी माँ का दर्ज देना होगा ... आप दे सकते हैं क्या ? आप माता महा काली से बात तो क्या ध्यान में भी उनकी मूर्ती तक के दर्शन नहीं कर सकते ... पहले आप स्वामी जी कि पूरा जीवन चरित्र पढ़िए फिर खुद को उस चरित्र कि तरह ढलने को कोशिश कीजिये ... तब जाकर कहीं सिर्फ उम्मीद करिये कि आप पत्र हैं ... लकिन पात्रता इस बात कि गारंटी नहीं है कि आप ऐसा करने में सफल हो ही जायेंगे ...!

पता नहीं आज कि दुनिया में क्यों लोग सीता कि कामना करते हैं जब वो खुद राम नहीं हैं ?
क्यों लोग स्वामी रामकृष्ण कि तरह करना चाहते हैं जबकि उनका खुद का चरित्र स्वामी जी के हजारवें भाग के जितना भी नहीं है ?
क्यों लोग सिद्धियों के पीछे भागते हैं जबकि उनके लिए एक आसान पर ५ मिनट भी बैठा नहीं जा सकता ?
क्यों ?

लेकिन शायद इस सवाल का जवाब तो नियति के पास भी न हो ... क्योंकि पगडण्डी / छोटा रास्ता लोगों कि पसंद बन गया है ... कोई भी समग्र रस्ते का चयन नहीं करना चाहता ... लकिन फल समग्र चाहता है ....

ये तो था मेरा अपना अनुभव जो मैंने महसूस किया ... अब अपने अगले एपिसोड से हम उन विधियों का आकलन करेंगे जो कि कुण्डलिनी जागरण में सहायक हैं ..... और अंत में मैं उस विधि का उल्लेख करूँगा जो कि मिश्रित विधि है और जिसका मैं पालन किया था और उसका फल बहुत ही प्रभावशाली था .



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